
न उनके लिए अश्क़ अपने बहाएँ।
तुम्हें छोड़ जो गैर सँग मुस्कुराएँ।।
किसी नज़्र से खौफ़ मुझको नहीं है
मिली है मुझे माँ तुम्हारी दुआएँ।।
नहीं फ़र्क पड़ता किसी को अगर है
उन्हें कैफियत क्यों हम दिल की सुनाएँ।।
ज़माने में रुसवा किया बारहा है
भला उनसे कैसे हम रिश्ते निभाएँ।।
न माँ-बाप का ख़्याल रखते हैं अपने
उन्हें हम ज़रा भी न मुँह से लगाएँ।।
त’आल्लुक निभाने की बस शर्त इतनी
किसी को न हद से ज़ियादा झुकाएँ।।
रखें जेब में आप अपनी रईसी
मुझे मत सुनाएँ मुझे मत बताएँ।।
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश



