
निकल चलो अब इस बस्ती से
बेईमानों की बदनाम कश्ती से
शर्मसार हो गया है मान सम्मान
अब ना बचेगा यहाँ आत्मसम्मान
हर मोड़ पे जहाँ खड़ा है लुटेरा
कैसे करूँ उस बस्ती में मैं बसेरा
सभ्य लोग का जीना हुआ हराम
कोई राह दिखलाओ मेरे भगवान
लुट खसोट की खुल गई है बाजार
जहाँ बिक रही है ओछी संस्कार
समाज में फैल रही तेजी से विकार
कैसे हो इन चोरों का जग से बहिष्कार
यही सोंच कर आत्मा जार जार है रोता
लुट खसोट बनी धनवानों की स्त्रोता
अट्टालिका पे चढ़ कर हँस रहा है गुमान
निश्चित ही ये सब् हो जायेगा गुमनाम
मानव हो शराफत से कर लो यहाँ प्यार
धर्म ईमान से मत कर भाई तकरार
अन्त दिन जब आयेगा पछतायेगा यार
मेरी सोंच पे करना एक बार तुँ विचार
उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बांका बिहार




