
एगो पुरान दंत कथा ह-
तीन आदमी ठेला में पाथर ढोवत रहलं।
बारी बारी से पुछाइल कि-उ का करत हं?
“देखात नाहीं कि पाथर ढोवत हईं”-
पहिलका कहलस !
“बाल -बच्चन खातिर रोटी कमात हईं”-
दुसरका ठंडी आह भरिके बोललस!!
“हम देव-मन्दिर बना रहल बांटी “-
तिसरका गर्व से उत्तर देहलस!!!
तीनहूँ सच कहत रहलन —
पहिलका अउर दुसरका क सत्य विशाल सत्य क अंश रहल।
बकि केवल तिसरका ही संसार में आपन स्थान समझत रहल,
अपने के इतिहास क अंश समझत रहल।
इ यक्ष प्रश्न पर-
रउरहूँ आत्म- चिन्तन करीं…।
चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन “गोरखपुर,
चलभाष -९३०५९८८२५२




