साहित्य

सितम

राजीव त्रिपाठी

सितम
ज़ख़्म कुछ नए दे गया
सितम कुछ नए दे गया!!
प्यार का वादा था जिससे,
प्यार का कुछ असर दे गया!!
वह मेरी वफ़ा के बदले में,
इतना मग़रूर हो गया!!
मैं तन्हा जुझता रहा दिल से,
मुझको जीने की वह कसम
दे गया!!
उसके आने से घर में रौनक,
सी आ जाती है!!
वो शख़्स आया और मुझको
चमन दे गया!!
उससे बेहतर तो ज़माने में
कोई नहीं,
यही सोच कर वह अपने,
ग़म दे गया!!
तन्हा साथ रहना उससे
मुश्किल था,
इसलिए मुझको वह कफ़न,
दे गया!!
दिल में एक दर्द सा
उभरता है,
मरहम मांँगा था मैंने
ज़ख़्मो पर
नमक दे गया!!
इतना आसान नहीं है
भूलना उसको!!
यादों के ज़िन्दगी में,
वह बवंडर दे गया

– राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान

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