
बेटे बहू के जाते ही ओम प्रकाश जी ने रुंधे गले से कहा देख रही हो रुक्मणि हमने जहां से जिंदगी शुरू की थी वापस वहीं पर आ गए ।
आप क्यों परेशान होते हो जी । हमने अपना फर्ज और कर्तव्य दोनों पूरा कर दिया । अब हम जिम्मेवारियों से मुक्त एक दूसरे के साथ खुशी खुशी खुल कर जिंदगी का आनंद उठाएंगे । साथ साथ घूमना, खाना, दान,पुण्य, तीर्थ सब दिल खोल कर करेंगे । अब इस बुढ़ापे में न किसी का लेना न किसी को देना । बस आप मेरी लाठी बनना और मैं आपकी लाठी बनूंगी ।एकदम आजाद हैं अब हम । हमें तो इन सब के लिए भगवान का आभार व्यक्त करना चाहिए ।
ओम प्रकाश जी अच्छी तरह देख रहे थे कि रुक्मणि इतनी अच्छी अच्छी बातें करते हुए बीच बीच में साड़ी के पल्लू से अपनी आंखों के कोर को बार बार पोंछ रही थी, जिसे ओम प्रकाश जी से छिपाने की कोशिश भी कर रही थी ।इसका मतलब साफ था कि ओम प्रकाश जी के जिस दर्द को वह कम करना चाह रही थी वही दर्द वह खुद के अंदर भी महसूस करते हुए बखूबी दबाने की कोशिश कर रही थी ।
फिर भी ओम प्रकाश जी ने कहा हां रुक्मणि कुछ तो संतोष करना ही पड़ेगा । लेकिन रुक्मणि हमने तो यह सोच कर इसे गोद लिया था कि बुढ़ापे में ये हमारा सहारा बनगा । लेकिन हमें क्या पता था कि एक दिन ये हमसे इस तरह रिश्ता तोड़ हमें यूं अकेला छोड़ अपनी अलग दुनिया बसा लेगा । हमने तो इस पर सब कुछ न्योछावर कर दिया रुक्मणि । फिर भी हम अकेले के अकेले ही रह गए ।
मैं क्या बोलूं जी । ये सब मेरी ही गलती है । मैं ही उसके मोह में अंधी हो गई थी । मैं ही आपकी बात नहीं समझ पाई । मैंने अपना भी सारा नारी धन बहू को सौंप दिया, और आपको भी सब कुछ उसके नाम कर देने के लिए मजबूर कर दिया । मुझे लगा किसी तरह उसे ये न लगे कि हम उसे अपना नहीं मानते । बस यही सब सोचकर उसकी मीठी मीठी बातों में आ गई । मैं उसका छल कभी समझ ही नहीं पाई ।
रुक्मणि अब इन सब बातों के लिए खुद को दोषी मानने का क्या फायदा है । मैंने तो तुम्हें समझाने की बहुत कोशिश की थी । लेकिन तुम्हारी जिद्द के आगे मेरी एक न चली । खैर अब इन सब बातों को याद करने का कोई फायदा नहीं ।
अब मैं जो तुम्हें बताने जा रहा हूं उसे ध्यान से सुनो । गाँव में अभी भी हमारी कुछ जायदाद है । जिससे हमारा बुढ़ापा बड़ी आसानी से कट जाएगा । संयोग वश उसके बारे में उसे तो क्या तुम्हें पता नहीं था । वरना वो भी हमारे हाथ से निकल जाती ।
हां जी बात तो आपकी एकदम सही है । काश हमनें इसे गोद ही न लिया होता । तो शायद ये दिन तो नहीं देखने पड़ते ।
रुक्मणि अब छोड़ो भी इन सब बातों को । उस समय तुम्हारी हालत ही ऐसी थी । तुम्हें बचाने का उस समय मेरे पास मात्र एक यही रास्ता रह गया था । बार बार होश में आने पर तुम अपने बच्चे को खोज रही थी । संयोग ऐसा हुआ कि एक तरफ तुम अपना बच्चा खोने के गम में पागल सी हुई जा रही थी । और दूसरी तरफ उसी अस्पताल में एक मां अपने नाजायज बच्चे को अपनाने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी । तब डॉक्टर की सलाह से मैंने उस बच्चे को तुम्हारी गोद में डाल दिया था ।
मैं तो अपने इस बेटे का एहसानमंद हूं उसी के कारण आज हम दोनों एक साथ हैं । उसी के कारण डॉक्टर भी तुम्हें मौत के मुंह से वापस लाने में कामयाब हो पाए थे । मैं तो यही सोच रहा हूं रुक्मणि कि चलो अच्छा ही हुआ कि अनजाने में ही सही, सब कुछ उसके नाम कर देने से मुझे उसके एहसानो का बोझ थोड़ा तो कम महसूस होगा ।
और अब हम गांव में शांति से अपना जीवन बिताएंगे । गाँव में आज भी लोगों में अपनापन की भावना जागृत है । जिसके कारण जिंदगी हंसी खुशी व्यतीत हो जाएगी ।
नीलम अग्रवाल “रत्न” बैंगलोर
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