
वह चाहती थी बस इतना सा,
कि कोई उसकी खामोशी पढ़ ले,
शब्दों में जो न उतर सका दर्द,
उसे कोई आँखों से ही समझ ले।
वह घर बनाती रही उम्र भर,
ईंट-ईंट सपनों से जोड़कर,
खुद का इक कोना छूट गया,
सबके कोने सलीके से सजाकर।
कभी स्त्री बनकर सहती रही,
कभी पत्नी बनकर चुप रही,
कभी माँ बनकर हर दर्द को वो,
सहज मुस्कान में बदलती रही।
उसकी हँसी को आदत समझा गया,
आँसू को कमजोरी कहा गया,
उसकी थकान पर दुनिया ने, ज़िम्मेदारी का नाम लिखा दिया।
वह चाहती है कोई पूछे,
उसे ,आज तुम कैसी हो?
कोई सुन ले बिना समझाए,
बिन कहे कुछ हर एक बात में।
वह बोली नहीं तो चुप्पी को,
उसकी सहमति मान लिया गया,
और उसके अधूरे सपनों को,
वक़्त की धूल में ढाँप दिया गया।
सुमन बिष्ट, नोएडा




