साहित्य

ये आदमी मशीन होते हैं

कुलदीप सिंह रुहेला

ये आदमी मशीन होते हैं,
दिन-रात पसीने में लीन होते हैं।
सीने में जलता है एक सूरज,
पर चेहरे पर संगीन होते हैं।

थककर भी रुकना जानते नहीं,
मुश्किल से झुकना जानते नहीं।
आंधी आए या बिजली कड़के,
हिम्मत से मुड़ना जानते नहीं।

पत्थर सी राहें चूमते हैं,
कांटों में भी फूल ढूंढते हैं।
खुद जलकर दीपक बन जाते,
और अंधियारों को बुनते हैं।

ये आदमी मशीन होते हैं,
पर भीतर अरमान भी रोते हैं।
फौलादी बाहों में दम होता,
पर दिल में सपनों के नोटे हैं।

जब देश पुकारे रणभेरी सी,
ये बनकर तूफान खड़े होते हैं।
हिम्मत की धड़कन बनकर ये,
हर जंग में शेर बड़े होते हैं।

ये आदमी मशीन होते हैं,
पर साहस के संगीन होते हैं।
मेहनत की धुन गुनगुनाते,
ये मानव होकर भी महान होते हैं।

कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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