
भारतीय राजनीति में सामाजिक तानेबाने को प्रभावित करने औरकि राजनीति की दिशा बदलने वाले दो बड़े प्रतीक रहे हैं—‘मंडल’ और ‘कमंडल’। 1990 में वी.पी. सिंह द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने से सामाजिक न्याय की राजनीति ने निर्णायक मोड़ लिया।किंतु इसके प्रतिउत्तर में भाजपा की सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की धारा मजबूत हुई,जिसने आगे चलकर अटल बिहारी बाजपेई और फिर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को व्यापक जनसमर्थन दिलाया।आज बहस एक नए प्रश्न के इर्द-गिर्द घूम रही है कि उच्च शिक्षा और संस्थागत प्रतिनिधित्व से जुड़ी ‘यूजीसी के इक्विटी बिल’ आधारित नीतियाँ क्या मंडल से भी बड़ा सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव उत्पन्न कर सकती हैं? और यदि हाँ, तो इसका सबसे अधिक असर किस पर पड़ेगा—भाजपा पर या उसके पारंपरिक मतदाता आधार पर?क्या सचमुच भाजपा अपने परम्परागत स्थाई मतदाताओं को खोने के लिए और चिरस्थाई सत्ता के लिए पिछड़ों,दलितों और मुस्लिमों के समर्थन की प्रत्याशा में यह दांव खेलकर सवर्णों को ही चित्त करने को ठान चुकी है?जो भी हो अगर ये आग सामान्य वर्ग के लोगों को भस्म करेगी तो किला भाजपाका भी स्वाहा होगा,इसमें तनिक संदेह नहीं है।हां,आने वाला समय ही इस रहस्य का और सही जबाव देगा,जो शायद सबके लिए स्वीकार्य हो अन्यथा गृहयुद्ध के दहाने पर खड़ा भारत अपनों के रक्तस्नान से ळुहुलुहान होगा।
प्रश्न जहां इक्विटी द्वारा अवसर का है तो इस पर
‘इक्विटी’ का तर्क कहता है कि ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को केवल समान अवसर देना पर्याप्त नहीं; उन्हें परिणामों में भी न्यायोचित प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।जबकि दूसरी ओर सामान्य वर्ग का एक हिस्सा इसे अवसरों के संकुचन के रूप में देखता है। सीमित सरकारी नौकरियाँ, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनिश्चितता और बढ़ती बेरोज़गारी के बीच यदि प्रतिनिधित्व आधारित प्रावधान और कड़े होते हैं, तो स्वाभाविक है कि असुरक्षा की भावना उभरे।यही असुरक्षा राजनीतिक असंतोष में बदल सकती है।यूजीसी के इक्विटी बिल में सवर्ण छात्रों के खिलाफ अकारण होने वाली शिकायतों की सत्यता जाने बिना उनके उत्पीड़न की आशंका बिल्कुल निराधार भी नहीं है।इस बिल द्वारा पिछड़े मुस्लिमों को सनातन विरोध का ब्रह्मास्त्र तो पिछड़ों और दलितों को अमोघ शक्ति मिल जाएगी।इस लिहाज से इस बिल का वापस होना ही कल्याणकारी है।आखिर सामान्य वर्ग के पास इसके विरुद्ध प्रतिकार और आंदोलन के अलावा कोई विकल्प भी तो शेष नहीं है।जबतक न्यायालय या स्वयं केंद्र सरकार इस बिल को यथोचित संशोधन सहित नहीं पेश करती या कि बिल को वापस लेती तबतक संघर्ष बंद होने की संभावना भी नहीं है और बंद भी नहीं होना है।हालांकि इस बिल का क्या होगा? यह अनिश्चित है किंतु पिछड़ों और दलितों में भाजपा अपने लिए स्थान बनाने का जो प्रयास की है,वह निष्फल भी नहीं दिखता है।
गली चौराहों से दिल्ली के जंतर मंतर तक यूजीसी इक्विटी बिल को लेकर सामान्य वर्ग का बढ़ता विरोध भाजपा के लिए बहुत हल्का नहीं होगा।सामान्य वर्ग भाजपा का स्थाई समर्थक रहा है।जिसकी नाराजगी से भाजपा की संभावित राजनीतिक यात्रा दम तोड़ सकती है,क्योंकि पिछड़ों और दलितों का कभी भी भाजपा से पक्का लगाव नहीं रहा है।हां,गैर यादव,गैर मुसलमान और गैर चमार ओबीसी तथा दलित अवश्य कुछ हदतक भाजपा का समर्थक हो सकता है,किंतु राज्यों में इनका लगाव भाजपा से अधिक क्षेत्रीयदलों से है।जिससे भाजपा के मत प्रतिशत में गिरावट होगी।इतना ही नहीं बूथों पर सामान्यवर्ग की भाजपा के प्रति नाराजगी बहुत भरी पड़ सकती है।भाजपा के बूथ स्तरीय कार्यकर्ता यदि बूथ परमजबूती से खड़े न हों तो मोदी की सारी योजनाएं धराशाई हो जायेंगी।यदि सामान्य वर्ग का एक भाग निराश होकर मतदान से दूरी बनाता है या विकल्प तलाशता है, तो भाजपा को सीधे नुकसान हो सकता है।इसी तरह संगठनात्मक उत्साह में कमी होने से भाजपा का जमीनी ढांचा जो लंबे समय तक इसी वर्ग के कार्यकर्ताओं से सशक्त रहा है,अब ध्वस्त हो सकता है।
इतना ही नहीं इससे विपक्ष को नया नैरेटिव मिलेगा। असंतोष विपक्ष के लिए “विश्वासघात” या “अवसरों की कटौती” का मुद्दा बन सकता है। सामान्य वर्ग बनाम आरक्षित वर्ग की प्रतिस्पर्धा तीखी होने पर दीर्घकालीन सामाजिक तनाव बढ़ सकता है।हालाँकि भाजपा ने 10% ईडब्ल्यूएस आरक्षण जैसे कदमों से संतुलन साधने का प्रयास भी किया है।किंतु यह भी सवर्णों के 50 प्रतिशत कोटे के अंतर्गत ही दिया गया है। इसलिए पूर्ण मोहभंग की धारणा अभी सर्वमान्य निष्कर्ष नहीं कही जा सकती।
अब प्रश्न उठता है कि क्या मुसलमान, ओबीसी और दलित स्वतः भाजपा के पक्ष में आएँगे?तो यह मान लेना कि इक्विटी आधारित नीति से मुसलमान, ओबीसी और दलित स्वतः भाजपा को समर्थन देंगे, राजनीतिक सरलीकरण होगा।मुसलमान भाजपा से उतनी ही घृणा और नफरत करते हैं जितनी वे सूअर से भी नहीं करते।इसलिए वे भाजपा को डुबोने वाले सभी प्रयास में भाजपा के गुण गाकर उसकी बड़ाई तो करेंगे किंतु चुनावों में कभी वोट नहीं देंगें।मुसलमान मतदाता का ऐतिहासिक झुकाव अभी भी भाजपा के प्रति संशयपूर्ण है।ओबीसी समुदाय के भीतर क्षेत्रीय विविधता और स्थानीय नेतृत्व का प्रभाव निर्णायक है।
दलित समाज में भी प्रतिनिधित्व के साथ सम्मान और सुरक्षा की अपेक्षा जुड़ी रहती है।नीति तभी वोट में बदलती है, जब उसके साथ भरोसे की निरंतरता जुड़ी हो।
कभी वीपी सिंह के मंडल पर भारी कमंडल की रणनीति अब कितनी कारगर होगी? यह यक्ष प्रश्न है।इतिहास गवाह है कि अतीत में जब जातीय तनाव बढ़ा, तो सांस्कृतिक एकता का आह्वान राजनीतिक औजार बना। परंतु आज का मतदाता केवल प्रतीक नहीं, बल्कि ठोस अवसर चाहता है—रोजगार, शिक्षा और आर्थिक सुरक्षा।यदि इक्विटी की बहस अवसरों के विस्तार के साथ जुड़ती है, तो भाजपा इसे “समावेशी विकास” के रूप में प्रस्तुत कर सकती है।लेकिन यदि यह सीमित संसाधनों की प्रतिस्पर्धा को और तीखा करती है, तो मंडल की तरह नया सामाजिक ध्रुवीकरण भी संभव है।
आज भाजपा के सामने मूल चुनौती सामाजिक संतुलन की है।सवर्ण असंतोष को शांत रखना और ओबीसी और दलित प्रतिनिधित्व को सुदृढ़ करना
तथा मुसलमानों के साथ संवाद की नई संभावनाएँ बनाना और सबसे बढ़कर, रोजगार सृजन द्वारा अवसरों का आकार बढ़ाना आदि ज्वलंत मुद्दे भाजपा को विचलित करने के लिए जहां काफी हैं तो इनके समाधान के साथ ही भाजपा और मजबूत भी हो सकती है।सिद्धांत के अनुसार राजनीति में स्थायी विजय उसी की होती है, जो असंतोष को संवाद में और प्रतिस्पर्धा को विस्तार में बदल सके।यदि भाजपा सभी वर्गों को यह भरोसा दिला पाती है कि उनकी मेहनत और योग्यता सुरक्षित है तथा अवसरों का दायरा सिकुड़ नहीं, बल्कि बढ़ रहा है—तो संभावित नुकसान अवसर में बदल सकता है।अन्यथा, सामान्य वर्ग का बढ़ता विरोध उसके लिए वैचारिक और चुनावी चुनौती दोनों बन सकता है।
मंडल और कमंडल की राजनीति अब ‘इक्विटी बनाम अवसर’ के नए विमर्श में प्रवेश कर चुकी है।भाजपा का भविष्य इस संतुलन पर निर्भर करेगा कि वह सामाजिक न्याय और समान अवसर की अवधारणा को प्रतिस्पर्धी असुरक्षा के बजाय सामूहिक प्रगति में कैसे रूपांतरित करती है।अंततः सवाल किसी एक वर्ग की जीत या हार का नहीं, बल्कि इस बात का है कि क्या भारत सीमित हिस्सेदारी की लड़ाई से ऊपर उठकर अवसरों का वास्तविक विस्तार कर पाएगा।यह समय वास्तव में सवर्णों के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह का है।यदि इस समय सामान्यवर्ग चुप रहा तो इतिहास कभी माफ नहीं करेगा और उनके बच्चों को गुलामी करने से कोई रोक नहीं पाएगा।इसलिए सामान्यवर्ग की नाराजगी अपनी जगह वाजिब है।अतएव भाजपा को विभाजनकारी इक्विटी बिल को वापस लेने में देर नहीं करनी चाहिए।
-डॉ.उदयराज मिश्र



