आलेख

शरीर के उत्सव में खोती आत्मा

डॉ. शीलक राम आचार्य

अब्राहमिक फैमीनीज्म से प्रेरित और पल्लवित अभिनेत्रियां,योग -शिक्षिकाएं,एयर होस्टेस,रिसैप्निस्ट, प्रबंधन क्षेत्र में कार्यरत युवतियां,नृतकियां,विश्वविद्यालयीन लड़कियां, सोशल मीडिया पर अर्धनग्न होकर रील बनाकर डालने वाली लड़कियां बोल्डनैस का मतलब नग्न होना मानती हैं। जिसके शरीर पर जितने कम कपड़े होंगे, उसे उतना ही अधिक बोल्ड माना जाता है।
बोल्डनैस को नग्नता,उघाडेपन और अंग -प्रदर्शन से जोड़ दिया गया है।बोल्डनैस को शरीर की कामुक मुद्राओं से आंका जा रहा है।नारी के शरीर पर जितने कम वस्त्र होंगे,वह उतनी ही अधिक बोल्ड, सुंदर और बोल्ड दिखेगी।
यदि इस प्रकार के अंग-प्रदर्शन,उघाडेपन और कामुक मुद्राओं को ही बोल्डनैस माना जायेगा तो फिर पुरुषों को भी ऐसा ही करना चाहिये। पुरुषों को भी ऐसा ही करना चाहिये। पुरुषों को भी बोल्ड क्यों नहीं होना चाहिये?बोल्डनैस का पैमाना लड़कियों और लड़कों के लिये भिन्न भिन्न क्यों है?
क्या पुरुषों के पास नग्न और उघाडा होकर दिखाने के लिये कुछ भी नहीं है?यह आश्चर्यजनक है कि यदि कोई लड़का उघाड़ा होता है,तो वह असभ्यता और फूहड़ता माना जाता है लेकिन लड़कियों के संबंध में इसका बिल्कुल विपरीत है। लड़कियों के लिये नग्नता और उघाडापन सौंदर्य का प्रतीक बन गया है।
लड़की हो या लडका हो-उघाडा होकर वो क्या दिखाना और क्या छिपाना चाहते हैं?इसका क्या रहस्य है?कुछ तो ऐसा जरूर है, जिस पर कोई भी खुलकर बोलना नहीं चाहता है। यदि कोई बोलने का दुस्साहस करे भी तो उस पर सभी नग्नता समर्थक और नैतिकता समर्थक टूट पड़ते हैं। लगता है कि ये दोनों वर्ग इस नग्नता की आड़ लेकर अपनी दमित ऊर्जा का रेचन करके राहत महसूस करने पर लगे हुये हैं।
सोचने की बात यह भी है कि यदि नग्नता और उघाडापन ही सौंदर्य या बोल्डनैस या प्रतिभा का आंकलन है,तो ऐसे में तो गधे, कुत्ते, बिल्ली,सुअर,भैंस,झोटे आदि पशु अधिक बोल्ड, सुंदर और प्रतिभाशाली हैं।
लगता है कि अपने खालीपन, अपने अकेलेपन, अपने तनाव,अपनी हताशा और अपनी चिंता को युवाशक्ति -वर्ग अपनी और अन्यों की कामुकता को उत्तेजित करके उससे राहत पाना चाहते हैं। इन सबके आगे, पीछे,ऊपर, नीचे और बीच में सर्वत्र उच्छृंखल कामुकता प्रधान हो गई है।आहार निद्रा,भय और मैथुन किसी भी प्राणी के लिये आवश्यक होते हैं, लेकिन इस तरह से इन्हीं में डूबकर जीवन जीना पशुओं के लिये सही कहा जा सकता है, मनुष्य प्राणी के लिये नहीं।
पिछले कुछ दशकों से यह इस प्रकार की जीवन- शैली अवगुण की जगह गुण में परिवर्तित हो गई है।इसे फैशन या आधुनिकता या आजादी या समान अधिकार कहकर महिमान्वित किया जा रहा है।
व्यापार, राजनीति, उद्योग- धंधों,कोरपोरेट -घरानों,होटल- व्यवसाय, फिल्म -उद्योग, धर्म,योग,कथा, सत्संग, जागरण, शिक्षा, परिवहन और विज्ञापन आदि सभी क्षेत्रों के चालाक लोगों ने महिला- वर्ग की इस नग्नता और उघाडेपन को अपने व्यापारिक हित साधने का जरिया बना लिया है।
आज किसी को कुछ भी बेचना हो तो वह विज्ञापन के रूप में महिलाओं की नग्नता और उघाडेपन का सहारा लेता है। चतुर और धूर्त लोग रुपया कमा रहे हैं लेकिन बहुसंख्यक जनमानस का जमकर शोषण हो रहा है। नैतिकता,जीवन-मूल्य, सात्विकता, सरलता,सहजता,संयम, अनुशासन आदि जायें भाड़ में।

डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र (हरियाणा)

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!