साहित्य

रक्तिम सूर्य

सुषमा श्रीवास्तव

आता सूरज, जाता सूरज,
कहता रहता वो तो हरदम।
चाहे सुख-दु:ख की बेला हो
एकभाव समभाव रहो तुम।
यही नियम संसार में शोभित,
मेरे रंग से सीखो तुम।
उदयांँचल हो या अस्ताचल,
रक्त सदा ही रक्तिम रहता,
शौर्य,ऊर्जा का संदेश है देता,
समरसता का प्रतिपादक महानतम।
परिस्थितियों से विगलित न होना,
जाओगे तो फिर आओगे,
यही सृष्टि की एकरूपता।
आना जाना लगा रहेगा,
कर्म – प्रारब्ध का लेखा जोखा,
इस जगत की है निरन्तरता।
आते सूर्य की अद्वितीय लाली,
जाते सूर्य की अद्भुत निराली,
कल की आशा से भर जाती।
खुशी-गम नहीं आने-जाने का,
इसी प्रेरणा से है भर जाती।।

– सुषमा श्रीवास्तव,रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!