साहित्य

ये देखना है माना जबसे तुमको अपना

नीलम अग्रवाल "रत्न"

माना जबसे तुमको अपना ।
अब काहे का दुख में तपना ।।

दूर हुए हैं दुख अब सारे ।
अब तो होंगे वारे न्यारे ।।
प्यार तुम्हारा सच्चा सपना ।
अब काहे का दुख में तपना ।।

झोली में सुख आए इतने ।
तीरथ मैंने घूमे कितने ।।
स्वर्ग लगे अब ये घर अपना ।
अब काहे का दुख में तपना ।।

महक रही है बगिया ऐसी ।
बिटिया चहके चिड़िया जैसी ।।
कितना प्यारा बालक अपना ।
अब काहे का दुख में तपना ।।

मैं तो अपने घर की रानी ।
जीवन लगता गुड़ की घानी ।।
प्रेम मिला जब तेरा सजना ।
अब काहे का दुख में तपना ।।

जीवन भर की बांधी डोरी ।
मैं तो हूं बस तेरी गोरी ।।
हाथ पकड़ कर साजन चलना ।
अब काहे का दुख में तपना ।।

नीलम अग्रवाल “रत्न” बैंगलोर🙏🙏

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