नारी, तूने हर युग में साबित कर दिखाया है,
हर बाधाओं का सामना दृढ़ता से किया है।
हर काल में कितनी ही परीक्षाएं दी हैं,
संकटों से कभी तूने हार न मानी है।
ऋषि, मुनियों से कम तप तेरा नहीं है,
गार्गी बन शास्त्रार्थों में तू ही जीती है।
देवों ने भी तेरी महत्ता स्वीकारी है,
तभी तो उनके नाम के आगे स्थान पाई है।
यम को भी झुकाने की तू सामर्थ्य रखती है,
सावित्री बन सुहाग की रक्षा तक करती है।
आंखों में जब क्रोध तेरे उतर आता है,
काली बन असुरों का नाश कर देती है।
साहस को जब -जब तेरे ललकारा है,
मैत्रेई बन अपने ज्ञान से ज्ञानियों को पछाड़ा है।
शत्रु की ललकार से कभी घबराई नहीं है,
लक्ष्मीबाई बन युद्ध में उतर जाती है।
उड़ान कल्पना की जब -जब भरती है,
अंतरिक्ष में राफेल भी उड़ा सकती है।
पढ़ने और पढ़ाने का जज्बा जब रखती है,
सावित्रीबाई फुले बन समाज को दिशा देती है।
पुरुषों के बराबर अधिकार का दम भरती है,
बेटा बन पिता को मुखाग्नि तक देती है।
ममता का गागर जब तू उडेलती है,
पुत्र को शिवाजी बनाने की शक्ति रखती है।
नारी, तूने साबित कर दिखाया है,
मर्यादाओं में रह लक्ष्य को अपने साधा है।
स्वरचित नन्द किशोर बहुखंडी
देहरादून, उत्तराखंड




