
जंग हर कहीं छिड़ गई है,
सिर्फ सरहदों में नहीं।
किसी को धोखे की जंग मिल रही है,
किसी को ज़िंदा रहने की ही जंग लड़नी पड़ रही है।
कहीं सच और झूठ की लड़ाई है,
कहीं इंसानियत खुद से ही लड़ रही है।
कोई अपनों के बीच हार रहा है,
कोई ज़िंदगी से ही जंग कर रहा है।
जंग सिर्फ मैदानों में नहीं होती,
दिल, घर और रूह तक पहुँच गई है।
बाहर शहर जल रहे हैं,
ख़बरों में हर रोज़ बर्बादी है।
इंसान ने ही इंसान पर वार किया,
और दुनिया इसे सियासत कह रही है।
और इस सब शोर के बीच कहीं,
हर दिल चुपचाप दर्द सह रहा है।
दुनिया जंग की कहानी लिख रही है…
और इंसान अंदर ही अंदर मर रहा है।
और फिर भी यह दुनिया
चुपचाप चल रही है।
जैसे किसी को फ़र्क ही नहीं पड़ता,
कि इंसानियत रोज़ थोड़ी-थोड़ी मर रही है। 💔
रंजीता निनामा
झाबुआ, मध्यप्रदेश



