
माटी का पुत्र किसान यहाँ, श्रम से धरती सजाता है,
सूखी डाली में भी अपने सपनों का फूल खिलाता है।
धूप जले या वर्षा बरसे, पथ से कभी नहीं डगमगाता है,
अन्न उगाकर हर मानव के जीवन में सुख भर जाता है।
जिसके श्रम से थाली में हर दिन रोटी मुस्काती है,
उसकी मेहनत भारत की हर श्वास में बस जाती है।
अब उसके गौरव के खातिर सिक्का भी मुस्काया है,
पाँच सौ का यह मान-चिन्ह किसान को शीश झुकाया है।
माथे की हर रेखा उसकी संघर्षों की कहानी है,
भारत की हर हरियाली बस उसकी ही निशानी है।
‘दिव्य’ कहे—जिस दिन श्रम का सच्चा मान बढ़ेगा,
उस दिन सच में भारत का गौरव जग में चमकेगा।
किसान अगर खुशहाल रहा तो देश सदा मुस्काएगा,
माटी का यह सच्चा प्रहरी भारत को स्वर्ग बनाएगा।
*दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*




