साहित्य
स्मृतियां

सुगंध की स्मृति से मन खिल खिल जाता है।
वो मां के हाथ का खाना बहुत याद आता है।
वह तेरी प्यारी सी झिड़की और मेरा भड़क जाना आज बहुत याद आता है।
वह मेरा देर तक सोना और तुम्हारा गुस्से में मुझे ना जगाना
बहुत याद आता है।
वह तुम्हारी हिदायतें, मुझसे ही ही काम ना करने की शिकायतें,
उन सबको अनसुना करके मेरा भाग जाना आज बहुत याद आता है।
आज उलझी हूं घर में सबके कामों में
जल्दी भी उठ जाती हूं,
सबके लिए खाना भी बनाती हूं।
फिर भी सब की शिकायतें सुनकर वो जमाना,
मेरा तुझसे रूठ जाना बहुत याद आता है।
बहुत उदासी में जब मैं सोती हूं,
याद तुझको मैं करके जब रोती हूं।
सपनों में आकर तेरा प्यार से सहलाना, मुझे गोद में सुलाना,
तेरी सुगंध का कमरे में भर जाना,
आज भी आंखों में आंसू और होठों पर मुस्कुराहट ले आता है।
मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा




