
मुझे भी सम्मान मिलना चाहिए,
मैं भी किसी की बेटी हूँ,
ये पहचान मिलना चाहिए।
मेरे सपनों का भी एक आसमान था
मासूम सी हँसी में बसा जहान था,
किसने छीन लिया वो उजला सवेरा,
मेरे जीवन का क्यों हुआ अंधेरा।
मेरी खामोशी को मत कमज़ोरी समझो,
मेरे आँसू को यूँ मत बेकारी समझो,
मैं टूटी नहीं हूँ, बस ज़ख़्मों से भरी हूँ,
मैं भी इस समाज की ही तो एक कड़ी हूँ।
मेरी भी हँसी लौट आनी चाहिए,
मेरी भी दुनिया मुस्कानी चाहिए,
जो दर्द मिला है इस नादान उम्र में,
उस पर मरहम की कहानी चाहिए।
मुझे दोषी कहने वालों ज़रा सोचो,
मैंने क्या अपराध किया था, ये भी पूछो,
मैंने तो बस जीने की चाहत रखी थी,
खुशियों की छोटी सी राहत रखी थी।
मुझे तिरस्कार नहीं, सहारा मिलना चाहिए,
इस समाज से फिर से किनारा नहीं चाहिए,
मैं भी इंसान हूँ, मेरा भी मान है,
मुझे भी इस दुनिया में सम्मान मिलना चाहिए।
अगर चाहो तो मैं इसे और भी ज्यादा भावुक, कवि सम्मेलन शैली में या अंतरा-मुखड़ा के साथ गुनगुनाने लायक भी बना सकता हूँ।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश



