साहित्य

मनमोहन

डॉ गीता पांडेय अपराजिता

छेड़-छाड़ राहों में करते, मटकी से माखन बिखराते।
पनघट को जब चलें गोपियाँ,गागर फोड़ कृष्ण छुप जाते।।

मुरली धर पर रीझ गई थी, बरसाने की राधा रानी।
प्रेम अमर हो गया जगत में , बनी युगों की अमिट कहानी।‌।

बसा लिए उर में मनमोहन, रूप मनोहर सुकुमारी का।
बिना राधिका नाम अधूरा, इस जग में है बनवारी का।

करें कृष्ण की बंशी मोहित, वृंदावन की बालाओं को।
सभी गोपियाँ मग्न दिखे हैं, करें प्रदर्शित मन भावों को।।

बरसाने की राधा गोरी,खेल रहीं कान्हा से होली।
गोपी ग्वाल बाल सब खेलें, बनकर कान्हा के हमजोली।।

कान्हा बिन राधा आधी हैं, बिना राधिका कान्हा आधा।
मनमोहन वृषभानु लली मिल, दूर करें जग की सब बाधा।।

कान्हा रंँगे राधिका को जब लाल गुलाबी गाल हुआ है।
प्रेम रंग में ऐसा रंँगते,
सालों साल मिसाल हुआ है।।

बंशी की धुन सुनकर दौड़ी, आती बृज बालाएंँ सारी।
हर गोपी से रास रचाते, अद्भुत लीला प्रभु की न्यारी।।

छेड़-छाड़ ऐसी हो जग में, भाव भरा हो जिसमें निश्छल।
द्वेष बुराई सारी तजकर,बहे प्रीत की धारा कल-कल।।

डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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