
ये सिलेंडर की मारामारी फिर से क्यों फैल गई,
भ्रष्टाचार की धूल से फिर हवा मैली हो गई।
रसोई की लौ बुझी-बुझी सी लगती हर घर में,
गरीब की थाली से जैसे किस्मत ही रूठ गई।
लाइन में खड़े लोग सुबह से शाम तक थकते हैं,
उम्मीद की डोरी पकड़कर फिर भी सब टिकते हैं।
कोई खाली हाथ लौटे कोई दिल में आह लिए,
रसोई की जंग में लोग कितने जख्म सहे लेते हैं।
कहीं ब्लैक का बाजार सजा कहीं दाम बढ़े चुपके,
ईमान की चौखट पर बैठे लालच के सब ऐसे हैं।
जिस गैस से चूल्हा जले, वही बन गई अब आफ़त,
सच बोलो तो लगता है जैसे सच भी डर जाए चुपके।
माँ की आँखों में चिंता, बच्चों की भूख पुकारे,
घर-घर में आज रसोई भी हालात से हारे।
कब बदलेगा ये मंजर, कब सच्चाई जीतेगी,
कब खत्म होगी ये ब्लैक और रिश्वत की दीवारें।
आओ मिलकर आवाज़ उठाएँ सच्चाई के गीतों में,
झूठ और लालच हारें जनता की प्रीतों में।
फिर से हर घर चूल्हा जले उजाले की लय पर,
और खुशियों की खुशबू घुले हर घर की रीतों में।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




