साहित्य

असर देखना है

शेख रहमत अली "बस्तवी"

नज़र से तुम्हारे नज़र देखना है,
निगाहों का कितना असर देखना है।

उमर संग गुजारेंगे खाई थी कसमें,
हुए कितने तुम बे-ख़बर देखना है।

तुम्हारे हवाले किया मेरा दिल भी,
मिरे दिल का तुझमें बशर देखना है।

मोहब्बत में मिलती हैं रुस्वाईयां ये,
यकीं कर लिया है मग़र देखना है।

महलों की “रहमत” नहीं आरजू है,
तेरा खूबसूरत सा घर देखना है।

शेख रहमत अली “बस्तवी”
बस्ती (उ. प्र.)
7317035246

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!