
चलो अब यहीं पर ठहर जाएंँ
ना हम तुम्हें ना आप हमें याद आए!!
बड़ी आसानी से कह दिया उसने
एक दूसरे को हम भूल जाएंँ!!
अब कहांँ रहा वह दौर मोहब्बत का
मुद्दत हो गई जवानी को ठुकराए!!
ग़लती दोनों तरफ़ से शायद हुई है
एक दूसरे से क्यों हम ख़फ़ा हो जाए!!
तुम्हारी ज़िन्दगी में क्या कमी है
ग़रीब आदमी को फिर क्यों सताए!!
कभी तुम मुझको आज़माओ
कभी हम तुमको आज़माएंँ!!
वादा वफ़ा मोहब्बत किस काम की
खोखले रिश्तो से हम बाज़ आए!!
वादे के बाद मुकर जाना अच्छा नहीं
एक दूसरे के थोड़ा क़रीब आए!!
नसीहत से नहीं चलती ज़िन्दगी
आप यह ज़हमत अब ना उठाएं!!
देखे होंगे ख़्वाब हमने जन्नत के
थोड़ा ज़िन्दगी पर एतिबार हो जाए..!
स्वरचित- राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान




