साहित्य

मन की परछाइयां

सौ, भावना मोहन विधानी

मन के सूने गांव में कभी-कभी,
परछाइयों का लगता मेला है।
चारों तरफ रिश्ते ही रिश्ते हैं,
फिर भी मन हर पल अकेला है।

कुछ बीते लम्हों की परछाइयां,
मन को बेचैन कर जाती है।
सारे दृश्य आंखों के सामने आकर,
रिश्तो की डोर को तोड़ जाती है।

कभी पुराने रिश्ते याद आ जाते है,
और मन खुशी से डोलने लगता है।
ये मन भी परछाइयों के साथ साथ,
खुशियों के बोल बोलने लगता है।

कभी छा जाता है मन में अंधेरा गहरा,
रोशनी की किरण नजर नहीं आती।
कभी हट जाते हैं दुख के बादल काले,
जिंदगी इंद्रधनुष सी सज जाती है।

सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र

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