
भगवान श्रीकृष्ण को शाश्वत जगद्गुरु ऐसे ही नहीं कहा जाता। उनकी प्रत्येक लीला, हरेक प्रसंग अपने भीतर इस संसार के लिए जाने कितनी शिक्षाएं छुपाये होता है। उनके प्रत्येक प्रसंग में ज्ञान का गहरा रत्नाकर हिलोरें मारता है। उनके किसी भी प्रसंग की चर्चा करके देखते हैं तो पाते हैं कि उसमें ज्ञान, विज्ञान, भक्ति और प्रेम का अगाध सागर अपनी विशाल तरंगों के साथ उछाल मार रहा है। किन्तु हम संसार रूपी रेत में ही लिपटे हुए हैं। एक बूंद भी उस जल तरंग की स्वयं के ऊपर नहीं गिरने देते। चलिए आज उन्हीं प्रसंगों का आनंद लेते हैं।
कंस के कारावास में माता देवकी और वसुदेव जी अति दीन अवस्था में अत्यंत भयभीत हैं। ये भय इस संसार का है। संसार के विषयों में लिप्त मन का है। उन्हें भय कंस का है कि वो मेरी इस संतान का भी वध कर देगा। जैसे अब तक छः संतानों का वध कर चुका है। सन्तान क्या है… ये संतान वो प्रयास हैं, जो जीव को आत्मा की पहचान कराने वाले हैं। बार बार इन पर आघात होता है। इन मार्गो को अवरुध्द कर दिया जाता है। बलात् मन को खींच कर संसारी विषयों में घसीटा जाता है। किन्तु माता उस संसार से, उन संसारी विषयों से लिप्त होने से बचने के लिए छटपटाती हैं। किन्तु कंस रूपी कलयुग उन्हें फिर से बलपूर्वक खींच कर उसी स्थान पर ला खड़ा करता है और माता पुनः भय से थरथर काँपने लगती हैं।
माता को कुछ नहीं सूझता, वे अपने हृदय के वात्सल्य भाव को पोषित करती हैं और अपनी संतान के प्रति अपने प्रेम की बाढ़ में बहने लगती हैं। अचानक से एक अद्भुत चमत्कार होता है। प्रेम से बल पाकर भक्ति के साथ भगवान उनके हृदय में आ विराजते हैं। जैसे ही भगवान का हृदय में आगमन होता है इन्द्र और मन के साथ सभी देवगण उनकी स्तुति करने आ पहुँचते हैं। ये इंद्रादि देवगण कौन हैं। जब ठाकुर जी के ज्ञान का उद्भव हुआ तो क्या पाया..? इन्द्र बुद्धि है, ब्रह्मा जी मन हैं, देवी सरस्वती वाणी हैं। वायु श्वास है, सूर्य और उसकी ज्योति नेत्र हैं, बाकी सभी देवगण हमारी इन्द्रियां हैं कान, नाक, हाथ, पाँव, श्वसन आदि। सभी भगवान के हृदय में आ विराजते ही भक्ति और भगवान की स्तुति करने लगते हैं। भगवान का सान्निध्य मिलते ही उन्हें संसार के ताप से मिली हुई भीषण पीड़ा से शीतलता मिलनी आरम्भ हो जाती है। मन का भय भाग जाता और हर्ष का आगमन हो जाता है। मन के हर्षित होते ही मुखमंडल पर प्रसन्नता रूपी चमक आ जाती है।
चलिए, आगे बढ़ते हैं। अब देखिये, वसुदेव जी बंधनों में जकड़े हुए हैं। सात द्वारों के भीतर बंद हैं। प्रत्येक द्वार पर भयावने पहरेदार पहरा दे रहे हैं। बड़ा सख्त पहरा है। न कोई बाहर से भीतर आ सकता है और न ही कोई भीतर से बाहर जा सकता है। किन्तु जैसे जैसे प्रसव का समय निकट आता जा रहा है. बँधन ढीले पड़ते जा रहे हैं। जैसे ही भगवान हृदय से बाहर आकर प्रत्यक्ष खड़े हो गए, समस्त बँधन स्वतः ही खुल गये। पहरेदार रूपी विषय सो गये और हृदय में पड़ी हुई गांठों रूपी सातों द्वारों के ताले स्वयं ही खुल गए और वसुदेव जी के लिए बाहर जाने का मार्ग खुल गया।
वसुदेव जी कृष्ण को गोद में उठा कर कलेजे से लगा कर लेकर चल दिये। बाहर निकले तो भीषण गर्जना के साथ मेघों ने स्वागत किया, मानों शंखनाद हो रहा हो, दुन्दिभियां बज रही और बूँदों के रूप में उनके ऊपर पुष्प वर्षा हो रही हो। शेष जी उनके रक्षक बन गए हैं। किन्तु आगे मार्ग में वहां कृष्ण की प्रिया यमुना जी प्रतीक्षा कर रहीं हैं। वसुदेव जी के मार्ग की बाधा बन गईं हैं। वे कृष्ण की चरण वन्दना करना चाहती हैं, किन्तु कर नहीं पाती हैं। कैसे करें? भगवान तो भक्त की गोद में बैठे हैं। जब तक वे आज्ञा न दें, भगवान उन्हें चरण वंदना करने नहीं दे सकते। वसुदेव जी ने यमुना जी के बढ़ते वेग को देखकर कृष्ण की रक्षा करने के लिए उन्हें अपने सिर पर रख लिया। देखिये कैसी अलौकिक भक्ति है, भक्त भगवान की रक्षा कर रहे हैं। भक्त भगवान को डूबने से बचा रहे हैं। किन्तु यमुना जी तो हठ पर अड़ गईं हैं। वैसे भी नारी हठ तो यूँ भी जग प्रसिद्ध है। जब नारी हठ पर आती है तो बड़े बड़े धीर वीर भी पराजित हो जाते हैं। यहाँ वसुदेव जी भगवान को डूबने से बचाने के लिए अपने हाथों को और ऊपर कर लेते हैं। किन्तु जैसे ही यमुना जी वसुदेव जी को डुबोने के उद्धत हुईं भगवान ने तुरन्त अपने चरण यमुना जी के समक्ष कर दिये। भक्त के प्राणों की रक्षा होनी चाहिए, फिर वहां कोई नियम टूटे या फिर विधान छूटे। भक्त का अनिष्ट नहीं होना चाहिए। भक्त नहीं डूबना चाहिए। अपने भक्त को वे भक्तवत्सल भला कैसे डूबने दे सकते हैं। भगवान के चरण स्पर्श करके उनकी वंदना करके यमुना जी ने प्रसन्न होकर वसुदेव जी को स्वयं ही मार्ग दे दिया और वे गोकुल आ गए।
वसुदेव जी ठाकुर जी को लेकर गोकुल आ गए, जहां उसी समय योगमाया का धरती पर प्राकट्य हुआ है, जिस समय ठाकुर जी के चरण कमल यहां आये। देखिये, कैसा संयोग है? योगेश्वर और योगमाया एक साथ ही धरती पर आये। योगेश्वर देवकी और वसुदेव की गोद में तो योगमाया नंद बाबा और यशोदा मैया की गोद में। किन्तु यहां भी घटना अद्भुत घटी। वसुदेव जी को योगेश्वर के जीवन की चिंता हुई और वे उन्हें सुरक्षित करने का उपाय करने लगे और योगमाया में फंस गए, वहीं दूसरी ओर नंद बाबा और यशोदा मैया की गोद में योगमाया है, किन्तु वे उससे निर्लिप्त सो रहे हैं। उन्हें योगमाया का भान ही नहीं हुआ ।उन्हें पता ही नहीं है कि योगमाया वहां आ चुकी हैं, वे तो कृष्ण प्रेम में डूबे हुए हैं। उनके अतिरिक्त और कुछ चाह ही नहीं है तो स्वयं योगेश्वर उनकी ओर दौड़ पड़े। सभी बंधन और विघ्न बाधाओं को काट कर भगवान अपने भोले भक्त के पीछे दौड़ रहे हैं।
वसुदेव जी योगमाया यशोदा नंदिनी को सोती हुई यशोदा मैया की गोद से उठा लेते हैं और योग योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण को उनकी गोद में लिटा देते हैं और वापिस आ जाते हैं। देखिए कैसा प्रभाव है? जब वसुदेव जी कृष्ण को लेकर चले तब अनेक बाधाएं आईं किन्तु वसुदेव जी के मार्ग अवरुध्द होकर भी उनके चरण नहीं रुके। किन्तु जैसे ही योगमाया उनकी गोद में आईं, उनके चरण वापिस से उन्हीं बंधनों की ओर चल पड़े। माया का प्रभाव प्रबल हुआ और वसुदेव जी वापिस से उन्हीं बंधनों में जकड़ गए। जबकि नंद बाबा के घर उत्सव हो रहा है…. नंद के आनंद भयो… जय कन्हैया लाल की।
नंद बाबा के घर आनंद की वर्षा हो रही है। ज्ञान विज्ञान उनकी स्तुति कर रहे हैं। देवगण उनके भाग्य की सराहना कर रहे हैं और सभी कर्ता, क्रिया, कर्म आदि उनके दास बनकर उनकी आज्ञा का पालन कर रहे हैं।
जय हो योग योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण की
जय हो श्री राधा गोपीनाथ जी की
जय जय श्री राधे
✍🏻 *राधा श्री शर्मा*




