
मुंतज़िर आंखें और यह शब- ए- तन्हाई,
धड़कनों में गूंजती है तेरी रुसवाई।
दस्त ए हिज़्र में भटकता है ज़हन मेरा,
मस्कन बना है अब ये गम का घेरा।
नक्श ए पा के जुस्तजू में कट रही उम्र,
आजमाइश ए इश्क में टूटा है मेरा सब्र।
फसलों की ग़र्द में धुंधली है हर राह,
लबों पे दबी है एक ठंडी सी आह।
वस्ल की उम्मीद में गुजरेंगे ये माहों – साल,
आकाश अब तेरे बगैर जीना है मुहाल।
मुल्क राज “आकाश”




