
मेरे घर की दालानों में
गौरैया का वास हुआ।
पतझड़ में लगता जैसे,
हरा – भरा मधुमास हुआ।
दीवारों से कर समझौता,
झोंझ बनाती रहती है।
बच्चों की खातिर दाने
चुग कर लाती रहती है।
फुदक रही और चहक रही
गीत प्यार के गाती है।
तिनके जोड़े खुद ही वो,
घर अपना बनाती है।
कठिन क्षणों में उसके भी
सुख दुःख आता जाता है
मेरे घर की दालानों में
गौरैया का मन भाता है।
वाई.वेद प्रकाश
द्वारा विद्या रमण फाउंडेशन
शंकर नगर, मुराई बाग, डलमऊ, रायबरेली उत्तर प्रदेश 229207
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