
मैं हूँ इक नन्हीं गौरैया,
डोलती रहती घर आँगन बगिया।
1-वृक्ष लगाओ,खूब बढ़ाओ,
शाख-शाख पर चुन-चुन कर तिनके,
मैंनीड़ सलोना बनाऊँ मैं।
ची ची का मधुर गान सुनाऊँ मैं,
2-भोर हुई उठने का संदेशा देकर तुझे उठाती मैं।
मेरी संख्या कम होते देख,
जाग उठा है जन सैलाब,
घर-आँगन, बगिया चौबारे,
छत के ऊपर, मुंडेर-पाए पर।
दाना- पानी रखे जाते हैं,
कहीं कहीं झूले सजे सलोने,
झूलती हुई खुशी मनाऊँ मैं।
3-कुछ तो इतने हैं दिल वाले,
अपनी बोतल के ढक्कन से,
मुझ प्यासी की प्यास बुझाएं,
दिल से दुआ देती मैं ,
फुर्र फुर्र करती उड़ जाऊँ मैं।
4-मैं हूँ इक नन्हीं सी गौरैया,
छत आँगन, खिड़की मुंडेर पर,
रौनक रोज लगाऊँ मैं,
भूख लगे तो दाना चुगती,
पानी पीकर, डाल पर झूलूं,
खुशियों का संसार सजाऊँ मैं।
मैं हूँ इक नन्हीं गौरैया,
रोज सबेरे आऊँ मैं।।
रचनाकार- सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक कृति,सद्यः निःसृत, रुद्रपुर, उत्तराखंड।




