साहित्य

सरस्वती वंदना

दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’

हे हंस वाहिनी माँ,
हृदय में प्रेम भर दो।
जीवन अब हम सबका,
मेरी मात अमर कर दो।

हम पथ में भटक रहे,
मंजिल ना मिल पाई।
मंजिल जो पा ना सके,
मेरी आंख भर आई।।

हे हंस वाहिनी मां,…..

तुम ज्ञान की देवी हो,
संगीत की जननी हो।
वाणी में मधुरता दो,
हृदय में प्रेम भर दो।।

हे हंस वाहिनी माँ,….

मंचों पर मेरी माँ,
घर घर में मेरी माँ।
सुर-लय-ताल देकर,
हमें लोकप्रिय कर दो।।

हे हंस वाहिनी माँ,…..

नदियों में कल-कल हो,
विहगों में कलरव हो।
त्रितंत्री की मधुर धुन से,
जीवन में सुर भर दो।।

हे हंस वाहिनी माँ,….

वीणा की मधुर तानों से,
जीवन में रस भर दो।
ज्ञान-ज्योति से मेरी माँ,
मन का अंधकार हर दो।।

हे हंस वाहिनी माँ,…..

मेरे काव्य-संग्रह की,
मंजिल तक आ करके।
“दिव्य” के इस हृदय में,
अब एतबार भर दो।।

हे हंस वाहिनी माँ,……

वीणा की पावन धुन से,
जीवन में रस भर दो।
माँ शारदे कृपा करके,
सबका मंगल कर दो।।

हे हंस वाहिनी माँ,
हृदय में प्रेम भर दो।।

स्वरचित मौलिक, सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश

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