
कोई तुमसे पूछे अगर कभी,
मै कौन तुम्हारी लगती हूँ,
तुम इतना ही बस कह देना,
मैं स्वप्न सृजन के बुनती हूँ.
सुख़ दुःख की भरी झोली में,
बस साथ यही एक अपनापन ,
जग को जब बांटी थीं खुशियाँ,
पाया केवल बेगानापन ,
कोई तुमसे पूछे अगर कभी ,
तो इतना ही बस कह देना,
जीवन की उलझी राहों में,
मै साथ तुम्हारे चलती हूँ.
मैं चाँद सरीखे सपनों को,
नीले नभ में फैलाती हूँ,
गीतों के कोमल पंखों पर ,
मैं करुना दीप जलाती हूँ.
कोई तुमसे पूछे अगर कभी,
तो इतना ही बस कह देना-‘
”मैं कविता हूँ” मानवता के ,
अंतर्मन में रहती हूँ,
पद्मा मिश्रा, जमशेदपुर झारखंड,भारत




