साहित्य

छात्र आंदोलन के नाम पर अराजकता : शिक्षा नीति और संस्कारों का दर्पण

डाॅ०-शिवकुमार सिंह

शिक्षा किसी भी राष्ट्र के निर्माण की आधारशिला होती है। विद्यालय और विश्वविद्यालय केवल ज्ञान प्राप्ति के केंद्र नहीं होते, बल्कि वे भावी नागरिकों के व्यक्तित्व, विचार और चरित्र निर्माण के महत्वपूर्ण स्थल भी होते हैं। इसलिए जब इन्हीं शिक्षण संस्थानों से जुड़े छात्र आंदोलनों में अनुशासनहीनता, हिंसा, अभद्रता और अराजकता जैसी घटनाएँ सामने आती हैं तो यह केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं रह जाती, बल्कि यह समाज, शिक्षा व्यवस्था और हमारे संस्कारों के समक्ष एक गंभीर प्रश्न बनकर खड़ी हो जाती है।

 

आज भारत में छात्र आंदोलनों के नाम पर जिस प्रकार की कुछ घटनाएँ देखने को मिल रही हैं, वे निश्चित रूप से चिंतन का विषय हैं। लोकतंत्र में विरोध का अधिकार प्रत्येक नागरिक को प्राप्त है और छात्र भी अपनी समस्याओं, अधिकारों तथा मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से रखने के लिए स्वतंत्र हैं। स्वस्थ संवाद और लोकतांत्रिक विरोध किसी भी जागरूक समाज की शक्ति होते हैं, किंतु जब विरोध का स्वरूप मर्यादा की सीमाओं को पार कर देता है, तब वह अपने उद्देश्य से भटक जाता है।

 

जिस भाषा, व्यवहार और कार्यशैली का प्रदर्शन कुछ स्थानों पर देखने को मिला है, वह किसी भी शिक्षित समाज की गरिमा के अनुरूप नहीं कहा जा सकता। प्रश्न यह उठता है कि क्या हम अपने बच्चों को उच्च शिक्षा संस्थानों में इसलिए भेजते हैं कि वे केवल परीक्षा उत्तीर्ण कर डिग्री प्राप्त करें, या इसलिए कि वे ज्ञान के साथ-साथ विवेक, अनुशासन, सहिष्णुता और सामाजिक उत्तरदायित्व भी सीखें? यदि शिक्षा के केंद्रों से ही संस्कार और मर्यादा कमजोर पड़ने लगें तो यह पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का विषय है।

 

शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि एक ऐसे नागरिक का निर्माण करना है जो अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझे। जिस शिक्षा से संवेदनशीलता, विनम्रता और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की भावना समाप्त होने लगे, उस शिक्षा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता स्वाभाविक है।

 

जहाँ तक परीक्षाओं में पेपर लीक और अन्य अनियमितताओं का प्रश्न है, छात्रों की चिंता पूर्णतः स्वाभाविक है। मेहनत करने वाले विद्यार्थियों के भविष्य के साथ खिलवाड़ किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता। ऐसे मामलों में जो भी दोषी हों, उनके विरुद्ध कठोर और निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए। न्याय व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाएँ इसी उद्देश्य से स्थापित की गई हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को न्याय मिल सके और व्यवस्था में विश्वास बना रहे।

 

परंतु अपनी मांगों के समर्थन में आंदोलन करते समय कानून और व्यवस्था की मर्यादा बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। संविधान हमें अधिकार देता है, लेकिन वही संविधान हमें कर्तव्यों का बोध भी कराता है। किसी भी संवैधानिक संस्था, सार्वजनिक संपत्ति या समाज के अन्य वर्गों के प्रति अपमानजनक व्यवहार लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करता है।

 

वर्तमान समय में परीक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और विश्वसनीय बनाने की आवश्यकता है। इस दिशा में उठाए जा रहे सुधारात्मक कदम सकारात्मक पहल के रूप में देखे जा सकते हैं। यह समस्या किसी एक दिन में उत्पन्न नहीं हुई है। शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा, सफलता की अंधी दौड़, विद्यालयों के समानांतर कोचिंग संस्थानों का अत्यधिक विस्तार और सीमित अवसरों के कारण बढ़ता दबाव भी इस समस्या के पीछे महत्वपूर्ण कारण हैं।

 

आज आवश्यकता है कि शिक्षा व्यवस्था को केवल परीक्षा केंद्रित न बनाकर ज्ञान, कौशल और चरित्र निर्माण केंद्रित बनाया जाए। अभिभावकों को भी बच्चों पर केवल सफलता का दबाव डालने के बजाय उनमें धैर्य, संघर्ष क्षमता और नैतिक मूल्यों का विकास करना होगा। शिक्षण संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे विद्यार्थियों को केवल पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि जीवन के मूल्य भी सिखाएँ।

 

इस पूरे घटनाक्रम का सकारात्मक पक्ष यह रहा कि संवाद और समाधान के प्रयास किए गए तथा संबंधित विषयों पर कार्रवाई की पहल हुई। लोकतंत्र में बातचीत के माध्यम से समाधान निकालना ही सबसे उचित मार्ग है। वहीं दूसरी ओर यदि किसी आंदोलन में हिंसा, तोड़फोड़, अभद्र भाषा या अनुशासनहीनता का सहारा लिया जाता है तो वह आंदोलन की गरिमा को समाप्त कर देता है।

 

सबसे चिंताजनक स्थिति तब उत्पन्न होती है जब समाज के जिम्मेदार वर्गों, संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों, पत्रकारों अथवा देश की सुरक्षा में लगे जवानों के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया जाता है। असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन असम्मान लोकतंत्र की कमजोरी बन जाता है।

 

आंदोलन, अनशन और शांतिपूर्ण विरोध किसी भी जीवंत लोकतंत्र की पहचान हैं, किंतु अराजकता, हिंसा, गाली-गलौज और सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुँचाना किसी स्वस्थ समाज का परिचायक नहीं हो सकता।

 

आज आवश्यकता है कि विद्यार्थी वर्ग, अभिभावक, शिक्षक, समाज और शासन सभी मिलकर इस विषय पर गंभीरता से विचार करें। हमें ऐसी शिक्षा व्यवस्था का निर्माण करना होगा जो युवाओं को केवल प्रतियोगिताओं के लिए नहीं, बल्कि जीवन की चुनौतियों के लिए भी तैयार करे।

 

यदि भारत को एक सशक्त, समृद्ध और गौरवशाली राष्ट्र बनाना है तो शिक्षा में ज्ञान के साथ संस्कार, अधिकारों के साथ कर्तव्य और स्वतंत्रता के साथ अनुशासन को भी स्थान देना होगा। राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानकर ही हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर भविष्य का निर्माण कर सकते हैं।

लेखक÷

कविराज डाॅ०-शिवकुमार सिंह ‘शिव’

दुसौंती रायबरेली-२२९३०६

केंद्रीय संगठन मंत्री

रायबरेली काव्य रस साहित्य मंच भारत

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!