साहित्य

गौरेया: एक नन्हीं वास्तुकार

कवयित्री ज्योती वर्णवाल

मेरे नए घर में गौरेया का बसेरा है,
कमरे की खिड़की पर उसनें डाला डेरा है ।

रोज़ सभी तिनका -तिनका चुनकर लाती है ,
अपने घर को मज़बूत और टिकाऊ बनाती हैं ।

‘चूँ-चूँ का शोर मचाकर सब को जगाती है ,
नन्ही सी जान कितना जज़्बा दिखाती है ।

चुन -चुनकर खर -पतवार और पुआल जुटाती है ,
मनमोहक अपना घोसला ,जाने कैसे बनाती है ?

अचरज है देख इसे,बड़े आर्किटेक्ट भी मात खा जाए ,
लाती है हुनर कहाँ ?काश !कोई हमें भी बताएँ ।

मेरे कमरे की खिड़की पर रोज़ उतर आती है ,
दाना चुगतीं हैं और अपने बच्चों को खिलाती है ।

फुदक -फुदकर कर घर भर में खुशियाँ फैलाती ,
वो छोटी सी चिड़िया ,हमे ‘ज़िम्मेदारी ‘का अहसास दिलाती है ।

कवयित्री ज्योती वर्णवाल
नवादा (बिहार)

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