
माँ अम्बा जय-जय कात्यायनी,
स्वस्तिक हस्त, महिषासुर मर्दिनी।
कठोर तप किए महर्षि कात्यायन ने,
प्रसन्न हुईं देवी, जन्मीं उनके आँगन में।
सुनहरा वर्ण है माता रानी का,
कात्यायनी रूप में तुम शक्ति स्वरूपा।
चतुर्भुजा धारी माँ विराजें,
दाहिनी ऊर्ध्व भुजा अभय मुद्रा साजे,
नीचे कर में वरदानी कृपा,
भक्तों पर बरसे असीम अनुपमा।
बाईं ऊर्ध्व भुजा में तलवार विराजे,
नीचे कर में कमल सुशोभित साजे।
रत्नाभूषणों से अलंकृत कात्यायनी,
आक्रामक सिंह पर आरूढ़ भवानी।
तेजमय आभामंडल, देवांश समाहित,
करुणामयी, दयार्द्र, जगत की हितैषी।
मइया को प्रिय मधु का भोग लगाओ,
नवरात्रि की शुभ घड़ी में साधना सजाओ।
जो श्रद्धा से करे तुम्हारी आराधना,
न रहे भय, न शोक—पूर्ण हो साधना।
स्वरचित
डाॅ. सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




