साहित्य

ज्वाला

जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी "जीत"

शाम थी—पर भीतर कहीं सूरज जल रहा था,
तीन युवाओं की साँसों में एक देश पल रहा था।

भगत सिंह की आँखों में भविष्य की रोशनी थी,
शिवराम राजगुरु की हँसी में निर्भयता की गूंज,
और सुखदेव थापर की चुप्पी
अन्याय के विरुद्ध उठता हुआ पूरा आकाश थी।

अंग्रेजी हुकूमत ने डर की दीवारें खड़ी कीं,
पर इनकी हिम्मत ने हर ईंट को सवाल बना दिया।

वे जीना भी जानते थे,
पर उन्होंने मरना चुना—

क्योंकि मातृभूमि की साँस
उनकी अपनी साँस से बड़ी थी।

फाँसी का फंदा उस दिन
रस्सी नहीं, एक संकल्प था,
जिसे पहनकर वे अमर हो गए—
जैसे बीज धरती में उतरकर वृक्ष बन जाता है।

आज भी जब कोई युवा
अन्याय के आगे सिर उठाता है,
तो लगता है—वे फिर जन्म ले चुके हैं,

क्योंकि यह देश उन्हीं का है
जो अपने जीवन से पहले
मातृभूमि को चुन लेते हैं।

– जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी “जीत”
युवा लेखक, कवि एवं साहित्यकार छत्तीसगढ़

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!