आलेखसाहित्य

अंत एक व्यथा का (पौराणिक आख्यान)

वीणा गुप्त

भाग 1
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आज फिर प्रतिदिन की भाँति  देवकी,अशांत थी। विगत कई  वर्षों से प्रतिपल एक अतृप्ति,एक व्यथा,को जी रही है वह। रात- दिन का चक्र बदलता है। प्रकृति में परिवर्तन हो रहा है।मधुमास और पतझर के आवागमन के अटल नियम यथावत हैं। केवल उसकी नियति वहीं जड़ हो कर रह गई है। उसके जीवन का कोई लक्ष्य नहीं। उसमें आशा की कोई किरण नहीं। एक स्मृति- वन  बन गया है उसका जीवन। उसका कोई वर्तमान, कोई भविष्य नहीं है। केवल रूका हुआ अतीत है जिसमें उसका मन प्रतिपल-मृग सम आस -मरीचिका में भटकता रहता है। श्रांत होता है, क्लांत होता है, लेकिन हार नहीं मानता।
उसकी पूरी रात आँखों में व्यतीत होती है। प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्त में आकर वह अपने भवन की छत पर आ बैठती है। निहारती है अनिमेष शून्य की ओर। भोर का नभ भी उसके हृदय की तरह ही व्यथा से  आर्द्र है। हल्के श्याम रंग के बादल उसमें छाए हैं। कुछ धुंधले होते तारे उसमें ऐसे ही रह -रह कर चमक  उठते हैं,जैसे उसके मन में अतीत की स्मृतियाँ कौंधती हैं। ये स्मृतियाँ उसकी पीड़ा को और गहरा देती हैं। धनीभूत पीड़ा अश्रु  बनकर अनवरत छलकने लगती हैं। ये श्याम घन उसे अपने आठवें लल्ला की याद दिलाते हैं। ऐसा ही तो था उसका लल्ला , नीलमणि सा कांतिमान,अभिराम

कितनी अभागी है वह भी।उसके छह नवजात सुत, उसके ही सामने नृशंसता से मृत्यु के घाट उतार दिए गए। सातवाँ गर्भ अजन्मा ही नष्ट हो गया।  उसकी अतृप्त ममता का का रूदन अग- जग को आप्लावित कर गया,पर उसके निष्ठुर  वज्र -हृदय भाई कंस का कलेजा रंच मात्र भी नहीं काँपा। उसका पैशाचिक अट्टहास आज भी उसके कानों में गूँज रहा है।
आज लगभग दो दशक हो गए उस भयावह  काल चक्र को घटित हुए, जिसने उसके हँसते- खेलते अठखेलियाँ करते ,नव यौवन को रौरव नर्क की अग्नि में अनिश्चित अवधि के लिए  धकेल दिया था । वह  घटना आज भी उसकी दृष्टि में जीवंत है। समय  की यह दीर्घ अवधि भी उसके इस व्रण को नहीं  भर पाई। रह- रह कर उसका मन मसोस उठता है। उसकी कसक कराह बन कर बहने लगती है। बहने देती है वह अपनी पीड़ा को निर्बाध। सबका अंत होता है, उसकी पीड़ा का भी होगा। कब?  कैसे? वह नहीं जानती, पर होगा अवश्य, उसे विश्वास  है।

भाग 2
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विश्वास तो उसे अपने सौभाग्य पर भी था। वह मथुरा के परम यशस्वी प्रतापी, यदुवंशी महाराज उग्रसेन के छोटे भाई  देवक की कन्या थी । गुण,शील ,सौंदर्य की साकार प्रतिमा। अपार दुलार और ऐश्वर्य में पली देवकी सबकी प्राणप्रिय थी।
उस दिन मथुरा नगरी ने उस दिन अनुपम श्रृंगार किया था। मथुरा की वीथियों को केसर जल से धोया गया था। स्थान -स्थान पर अनेक स्वर्ण वितान बने थे। अनेक कदली- तोरण और वंदन वार सजे थे। नगर -भवनों के द्वार पर, मंगल जल पूरित कनक- कलश रखे गए थे। नगर का कोना- कोना पुष्पों और इत्र की सुगंध से सुवासित था।
सुमधुर संगीत लहरी वातावरण को तरंगायित कर रही थी। परिजन और पुरजन आनंदातिरेक से भरे  हास- परिहास कर रहे थे। मणि और रत्नों की,आभा के समक्ष सूर्य की दीप्तिभी निष्प्रभ हो रही थी। वैभव और सौंदर्य अपने पूर्ण ऐश्वर्य के  साथ उपस्थित थे। और होते भी क्यों नहीं ?
यह कोई साधारण अवसर नहीं था। आज मथुरा की सबसे छोटी राजकुमारी देवकी के विवाह की मंगल वेला जो थी। आज देवकी का पाणिग्रहण वृष्णिकुल के राजा  शूरसेन के पुत्र, वसुदेव के साथ संपन्न हुआ था। उन दोनों की मनोहर जोड़ी ,अपने सौंदर्य से रति और कामदेव की जोड़ी को लजा रही थी। वीरता और  श्रृंगार का  यह मिलन अपूर्व था। आज सबसे अधिक प्रसन्न था उसका चचेरा भाई कंस। कंस,मथुरा का युवराज और  महाराज उग्रसेन का ज्येष्ठ पुत्र था, वह बहुत दबंग, शक्तिशाली और  दुराग्रही व्यक्तित्व का स्वामी था। उसके दुर्दांत व्यक्तित्व से सभी आतंकित रहते थे। उसकी बात मानते थे। लेकिन उस कंस के वज्र- कठोर हृदय में देवकी के प्रति कोमल स्नेहिल भाव था। वह उसे बहुत लाड़ करता था। उसकी हर इच्छा पूरी करता था। उसने ही अपने परम मित्र वसुदेव से उसका विवाह  करवाया था। वह विवाह  के अवसर पर बार -बार उनसे परिहास कर रहा था,” मित्र वसु !  अपनी प्राण- प्रिय भगिनी तुम्हें सौंप रहा हूँ, उसे लेश मात्र भी कष्ट नहीं होना चाहिए, अन्यथा मैं—-। ”

वसुदेव आतंकित होने का अभिनय कर रहे थे,
” युवराज कंस की भगिनी को कष्ट देने की बात तो मैं स्वप्न में भी नहीं सोच सकता । ”
” सोचना भी मत,इसी में तुम्हारा कल्याण है।” कंस  कहता।
सभी उपस्थित जन, जीजा- साले की इस ठिठोली का आनंद ले रहे थे। देखते ही देखते विदा की वेला आ गई। बंधु -बाधवों ,माताओं और सभी सखियों से गले लग, विदा ले, वसुदेव जी के संग,वह सुसज्जित स्वर्णिम  रथ पर आरूढ़ हुई। कुशल सारथि ने वर -वधू के रथ की रास,संभाली। इस विदा- वेला में पुरवधुओं का मंगल -गीत कारुणिक हो उठा। सभी नेत्र छलछला उठे।

इसी समय कंस ने आकर
,सारथि के हाथ से रथ की बागडोर अपने हाथ में ले ली, ” तुम नीचे उतर आओ सारथि, देवकी के रथ का परिचालन मैं स्वयं करूँगा।” उसने देवकी की ओर लाड़ से देखते हुए कहा।
चारों ओर से पुष्पवर्षा होने लगी। युवराज कंस ने रथ को मंथर गति से नगर के मुख्य- पथ पर परिचालित किया। चारों ओर से पुष्पवर्षा होने लगी। विदा- सूचक संगीत की मधुर मंगल- ध्वनि गूँज उठी।

इसी समय नभ में, प्रलय सम विद्युत कड़की और  भीषण गर्जन के साथ , एक गंभीर अशुभ स्वर  चारों  दिशाओं को कंपित करता हुआ गूँज उठा ,”अरे कंस, तू अपनी जिस भगिनी को, इतने स्नेह दुलार से उसके श्वसुरालय ले जा रहा है, उसके गर्भ से उत्पन्न ,उसका आठवाँ पुत्र तेरा काल बनकर जन्म लेगा। यही तेरी कठोर नियति है, जो टल नहीं सकती।” और एक भीषण अट्टहास  का स्वर गुँजाती आकाशवाणी मौन हो गई। सारा परिदृश्य  पूर्ववत हो गया। आकाश वैसा ही निरभ्र और मनोरम  हो गया।
लेकिन धरती पर पूर्णतः दृश्यातंर हो चुका था। किसी को अपने कानों  सुनी इस नभवाणी पर  विश्वास नहीं हो रहा था। सब हतप्रभ हो आकाश की ओर देख रहे थे। काश! इस अशुभ वाणी को मिथ्या करती हुई कोई और आकाश वाणी होती । पर यह मात्र दुराशा थी।
आकाश वाणी सुनते ही देवकी के प्रति कंस का सारा ममत्व , सारा दुलार उसी क्षण लुप्त हो गया। उसकी मुख मुद्रा कठोर हो गई। नेत्रों में रोष की अग्नि धधक उठी। उसका सर्वांग काँपने लगा । उसने तुरंत झटके के साथ रथ रोक दिया और  अश्वों की वल्गा पटक, अपने म्यान से तलवार निकाली और क्षण भर में ही कूद कर, देवकी की ओर बढ़ा।  उसने निर्ममता से, देवकी के केशों को  अपने हाथों में जकड़ कर झिंझोड़ दिया। देवकी की सुचिक्कण केश -राशि में सज्जित मणि- हीरक  अलंकार उल्का सम नीचे गिर  गए। उसकी सघन अलकें , उसके चंद्रमुख पर काली घटाओं सदृश धिर आईं। देवकी का सुंदर मुख, भय से विवर्ण हो गया। उसका रंग पीला पड़ गया। नेत्रों से अश्रु बहाती और, काँपती हुई वह  रथ की पीठिका पर  गिर पड़ी।
वसुदेव ने स्धिति को संभालने
का प्रयास किया।
” यह क्या कर रहे हैं युवराज? , क्या  भगिनी का वध करेंगे ? ” कहते हुए उन्होंने  प्रहार को उद्धत कंस का हाथ पकड़ लिया। लेकिन कंस ने  उन्हें धकिया दिया , और फटे हुए स्वर में बोला ” कौन भगिनी ? कैसी भगिनी? क्या तुमने आकाश वाणी नहीं सुनी ? यह मेरे काल की जननी बनेगी ? ऐसा होने से पूर्व , मैं इसका अस्तित्व ही निश्शेष कर दूँगा।” वह भयानक अट्टहास करता देवकी पर झपटा।
“नहीं युवराज, ऐसा मत कीजिए  यह,जघन्य अपराध है? ” परिस्थिति की भयावहता को समझ कर वसुदेव का अनुनय, याचना बन गया था। भयार्त देवकी अचेत हो गई। शुभ में अशुभ  व्याधात देख सभी पुरजन-परिजन एकत्र हो गए और कंस को समझाने  की चेष्टा करने लगे।
“विवेक  का परिचय दो युवराज। संयम से काम लो। एक निर्दोष अबला का वध तुम्हारे जैसे वीर को शोभा नहीं देता। अपने कुल की मर्यादा को कंलकित मत करो।” लेकिन  मृत्युभय  जनित क्रोध ने कंस को  विवेकशून्य  कर दिया था। तभी, इस अनहोनी से देवकी को बचाने का एक उपाय  वसुदेव  को सूझा ” मित्र भगिनी वध मत कीजिए।  भगिनी पुत्री समान होती है। आकाश वाणी ने देवकी के अष्टम पुत्र से अमंगल की बात की है। मैं देवकी के सभी पुत्र तुम्हें सौंप दूँगा। तुम उन्हें अपने पास  रख लेना , फिर तो किसी अनिष्ट की संभावना ही नहीं रहेगी। ”
वसुदेव का प्रस्ताव सुनकर ,कंस पल भर को ठिठका , उसने कुछ सोच- विचार किया और फिर क्रोध से पैर पटकता हुआ ,आग्नेय नेत्रों से देवकी को देखता हुआ, प्रहरियों को वसुदेव -देवकी को बंदी गृह में रखने का आदेश दे, अपने भवन में चला गया। जब उसके पिता महाराज उग्रसेन  ने उसके इस निर्णय का विरोध किया तो उसने, उन्हें भी सिंहासन से अपदस्थ कर बंदी गृह में भेज दिया,और स्वयं मथुरा का निरंकुश शासक बन बैठा।

भाग 3
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कारागृह  में  कैद देवकी और वसुदेव , नियति की इस क्रूरता को देखते, एक दूसरे को धीरज देते, अपना अभिशप्त जीवन यापन करने लगे।समय निर्बाध गति से बहता रहा। देवकी ने प्रथम गर्भ धारण किया। और कोई अवसर होता तो यह जानकर पति -पत्नी हर्ष का कोई ठिकाना नहीं रहता, पर  अब स्थिति प्रतिकूल थी।
“,क्या आप  हमारी इस संतान को सचमुच भ्राता कंस को सौंप देंगे ? क्या हम इसकी रक्षा नहीं कर सकते? “अश्रु भरे स्वर में देवकी ने पति से पूछा।
” मैं वचन बद्ध हू़ँ प्रिये।” वसुदेव की  विवशता अवर्णनीय थी।
गर्भ की  जैसे -जैसे पूर्णता की ओर जा रहा था, वैसे ही उन दोनों की मानसिक पीड़ा भी असह्य  हो रही थी। दिवस -रात्रि केवल एक ही चिंता उन्हें खाए जा रही थी। क्या भविष्य होगा उनकी इस संतान का? कंस इसे छोड़ देगा या —? यह अमंगल कल्पना ही उनके कलेजे को कंपित कर देती । अंततः  वह क्षण भी आ ही गया जब देवकी ने एक स्वस्थ पुत्र को जन्म दिया। हीरक दुति से कांति वान, कमल,जैसे कोमल पुत्र का स्पर्श, पा उसके नेत्र आनंद -अश्रु पूरित हो गए। हृदय में ममत्व का सागर उमड़ आया। उसने उसे वक्ष से लगा आंचल से छिपा लिया। और प्रलाप कर उठी, “नहीं दूँगी मैं अपने पुत्र को किसी को भी।चाहे  तो वह मेरे प्राण ले लें। लेकिन मैं इसे  किसी को नहीं दूँगी।”
इसी समय शिशु जन्म का समाचार पाकर कंस वहां आ गया।  वसुदेव ने देवकी  की गोद  में सुप्त नवजात को उठा कर कंस  की ओर बढ़ाया। देवकी का वात्सल्य कारूणिक हो गया। ” मेरे पुत्र की रक्षा करो भ्राताश्री, मैं आपसे याचना करती हूँ। आपके पैरों पड़ती हूँ। कृपया इसे जीवन दान दे दो।”
देवकी का आर्त क्रदंन कारागार  में गुंजित अनु गुंजित हो उठा।”  सभी प्रहरी,अंग रक्षक,और भृत्य भय से सिहर उठे। कंस का स्फीत अहंकार भी ठठा उठा।
” छुई मुई सा यह शिशु मेरा क्या ही कर लेगा? देवकी , रखो इसे तुम अपने पास ? मुझे तो केवल तुम्हारा अष्टम पुत्र ही चाहिए। वही तो मेरा काल बनेगा न ? देखता हूँ ,कौन किसका काल बनता है ।”  शिशु को तुच्छता से देखता,वह वहाँ से चला गया। वसुदेव -देवकी को अपने इस आकस्मिक सौभाग्य पर विस्मित थे। देवकी ने पुत्र को अपने आंचल में छिपा , उसे आपने अश्रुओं से स्नात कर दिया।। वसुदेव ने ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट की।
लेकिन नियति की अबूझ  गति कोई नहीं जानता। अपने भवन तक  पहुँचते-पहुँचते ही कंस  विचलित हो गया। उसके मन में भीषण अंतर्द्वंद्व छिड़ गया।  शायद देवकी के पुत्र को जीवन- दान देकर उसने  ठीक नहीं किया। शत्रु को कभी कम नहीं आँकना चाहिए। पाँव के नीचे का, छोटा सा तिनका भी  हवा के सहारे, उड़ कर आँख में पड़ जाने पर उसे हानि पहु़ँचा सकता है। छोटी सी चींटी गजराज को धराशायी कर सकती है। एक लघु बीज ही कालातंर में विराट वृक्ष बन जाता है। एक छोटा सा मंत्र भी बड़े विनाश का  कारण बन सकता है। क्या पता,कल यह शिशु भी बड़ा होकर उसके काल का रूप,धारण कर ले।। नहीं, वह अपने विनाश को प्रश्रय नहीं देगा। वह इस भावी आपत्ति  को उपेक्षित नहीं कर सकता। वह रात्रि भर इसी ऊहापोह में  करवटें बदलता रहा। उसके कानों में हर पल काल का अट्टहास गूंज रहा था। क्या पता  देवकी के आठवें पुत्र ने ही इस प्रथम संतान के रूप में जन्म ले लिया हो। वह अपने शत्रु को कोई अवसर नहीं देगा।
प्रातः होते ही वह कारागार की ओर चल पड़ा। और देवकी -वसुदे़व के समक्ष जा खड़ा हुआ। उसका अप्रत्याशित आगमन और बदली हुई भाव भंगिमा देख  दोनों भय विस्मित हो गए। देवकी ने शिशु को अपने आंचल में छिपा लिया।  इससे फहले  कि वसुदेव उससे कुछ कहते , कुछ पूछते ,उसने तुरंत ही शिशु को निर्दयता से देवकी की गोद से छीन लिया और धरती पर पटक दिया । शिशु क्रदंन- ध्वनि करता सदा के लिए मूक हो गया।  देवकी दुख और भय से अचेत हो गई।विवश वसुदेव छलकते नेत्रों से निर्ममता की इस पराकाष्ठा के मूक साक्षी बन कर खड़े रहे। जिसने भी सुना इस नराधम को धिक्कारा।  पर खुले रूप में इसका विरोध करने का साहस किसी में भी नहीं था।
फिर तो एक के बाद एक ,पांँच बार, इस निर्मम घटना की आवृत्ति हुई। जीवित-मृत सम पति- पत्नी अपनी अभिशप्त नियति का यह क्रूर खेल देखते रहे। लेकिन उनका धैर्य अडिग था। उन्हें विश्वास था उस आकाशवाणी पर। आस्था थी ईश्वर पर, जो पापी कंस की निरंकुशता पर अंकुश लगाएगा। पापी कंस के अत्याचारों का घट पूरी तरह भर चुका था। है। उसके फूटने का समय अब  निकट आ रहा था। कंस अपने को सुरक्षित समझ कर, मिथ्या आश्वासन देता। उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

वह अपने छह शत्रुओं का विनाश कर चुका था। बाकी के दो को भी वह इसी प्रकार नष्ट कर देगा। लेकिन जब उसे देवकी के सप्तम गर्भ का पता  चला, तो उसका भय पुनः लौट आया। भावी अमंगल के भय से  उसका सब सुख- चैन नष्ट हो गया। वह अतिरिक्त सतर्क हो गया। न जाने क्यों  उसे लगने लगा कि यह शिशु उसके हाथ नहीं आएगा। हर पल कारागार के पास किसी अपशकुन की तरह मंडराता रहता। वसुदेव कटाक्ष कर कहते,”युवराज। इस बार तो आपका भय अद्भुत है।  लौह श्रृखंला में आबद्ध, हम निरीह प्राणियों से और इस शिशु से ,आप जैसे महा पराक्रमी को भला क्या  क्षति हो सकती है?।” कंस उनके व्यंग्य वचनों  को  सुना अनसुना कर  देता।

और एक दिन कंस की आशंका सही साबित हुई। उसे पता चला कि देवकी का गर्भपात हो गया है। उसे इस पर विश्वास नहीं था। अवश्य यह पति- पत्नी का षडयंत्र है। उससे मिथ्या भाषण किया जा रहा है। राज वैद्य से, इस बात की पुष्टि करवाने के बाद भी, वह रंच मात्र भी आश्वस्त नहीं था। उसे प्रतिपल छले जाने का आभास होता।देवकी के अष्टम गर्भ की बात सुनकर तो वह विक्षिप्त अवस्था में पहुँच गया।  क्षण- क्षण की जानकारी लेता। उसकी भूख प्यास,सब समाप्त हो गई। उधर दंपति बेहद आश्वस्त थे। देवकी  ने एक स्वप्न में श्रीहरि का चतुर्भुज रूप देखा था। यह उनके लिए एक मंगल शकुन था। अब उनका मन आश्वस्त था। नियत अवधि पर अर्धरात्रि  को देवकी ने अष्टम पुत्र को जन्म दिया। उस  समय मूसलाधार वृष्टि हो रही थी। सभी प्रहरी अपने कार्य में पूर्ण प्रमाद दिखाते हुए अपने- अपने गृह- परिवार की सुरक्षा करने हेतु, कारागार की सुरक्षा  की उपेक्षा करते हुए,शीध्रता में वहाँ से चले गए थे। प्रचंड अंधकार और अवसर का लाभ उठाते हुए वसुदेव-देवकी ने अपने इस शिशु की रक्षा का प्रयास किया था। अपने प्राणों को जोखिम में डाल वसुदेव शिशु को लेकर, गोकुल गाँव में रहने वाले अपने मित्र नंद के पास  गए।उसी रात्रि को नंद की पत्नी यशोदा ने एक कन्या को जन्म दिया था, और  दुर्बलता से अचेत थीं । वे पुत्री जन्म  से अनभिज्ञ थीं। नव जात कन्या भी बहुत दुर्बल थी। नंद को उसके जीवन की कोई आशा नहीं थी। नंद जी की सहमति पाकर,उनकी मृत प्राय नवजात पुत्री को लेकर और अपने पुत्र को वहीं छोड़कर वसुदेव मथुरा लौट आए थे। प्रतिक्षण पति और पुत्र की मंगल कामना करती, इष्ट देवताओं को मनाती देवकी चिंता, और भय में ग्रस्त हुए बैठी थी।

भाग 4
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रात्रि का चतुर्थ प्रहर बीतने से पूर्व ही वसुदेव लौट आए। उनकी गोद में एक शिशु था। मेरा शिशु मेरे पास आ गया। देवकी विह्वल हो पति की ओर भागी। लेकिन उनकी गोद में उसका नील कांत शिशु नहीं था। एक कुंदन आभा दीप्त दिव्य रूप,संपन्ना  लेकिन बहुत दुर्बल एक कन्या थी।  “यह कौन है स्वामी ? आप इसे यहाँ क्यों ले आए? हाय! वह नराधम इसे भी मार देगा। ” देवकी बिलख उठी।  वसुदेव ने उसे शांत रहने का संकेत करते हुए कन्या को उसकी गोद में दे दिया और पूर्ववत् स्वयं को श्रृंखला बद्ध  कर ,देवकी को सभी बात बताई।
” पर यह तो पाप है स्वामी, अपने पुत्र की, रक्षा के लिए किसी दूसरे की संतान को अपना बता कर मृत्यु के गाल में  फेंकना । नहीं,  यह अधर्म  है।  मैं यह अनर्थ कदापि  नहीं होने दूँगी। कोख उजड़ने की पीड़ा मैं जानती हूँ, किसी अन्य माँ को  मैं  वह पीड़ा  कैसे दे सकती हूँ। और मैं कभी भी असत्य भाषण नहीं करूँगी।  ”
“बात समझो प्रिय, समष्टि की रक्षा के लिए व्यष्टि का बलिदान अधर्म नहीं है। किसी के हित के लिए बोला  गया  अब असत्य किसी के अहित करने वाले सत्य से श्रेष्ठ होता है। हम नियति  के अधीन हैं। इस कन्या की  नियति भी भविष्य के  गर्भ में है। जो होगा, हमें उसे हरि इच्छा मानकर स्वीकार करना ही पड़ेगा। तुम अपना और कन्या का ध्यान रखो। ईश्वर जो करेंगे, वही सबके हित में होगा।” वसुदेव ने उसे समझाया था।
भोर होते -होते वर्षा पूरी तरह रुक चुकी थी ।आकाश निरभ्र था।बालारुण की हल्की सी अरूणिमा उसे सौंदर्य दे रही थी। रात्रि क्लांति से थकित दंपति शीध्र ही निद्रा की आगोश  में लीन  हो गए। पर नवजाता की रुदन घ्वनि ने प्रहरियों को सजग कर  दिया। शिशु- जन्म का समाचार पाते ही कंस उन्मत्त सा भागकर वहाँ आ पहुंँचा। उसका शरीर भय से कांप रहा था। माथे पर पसीना छलक आया था।
फटे हुए स्वर से बोला,” तो आ गया मेरा काल। अभी इसे यम द्वार  पहुँचाता हूँ।” उसके गर्जन से  दंपति की नींद टूट गई। सामने साक्षात काल कंस को देखकर, भयार्त देवकी ने कन्या को अपने   आँचल में छिपा लिया। कंस ने उसे निर्ममता से छीन लिया।
“युवराज, यह शिशु पुत्र नहीं, कन्या है। इसे जीवन दान दीजिए।” वसुदेव ने अनुनय किया।
“कन्या ? कंस अचकचाया। “अवश्य ही कुछ षड़यंत्र है यह?  लेकिन आकाशवाणी  ने देवकी की अष्टम संतान को ही मेरा काल कहा था न? और यह तुम्हारी अष्टम संतान है, इसे तो यम पुर जाना ही होगा।”कहते हुए उसने रोती हुई कन्या को ज्यों ही उठाकर धरती पर पटकने का उपक्रम किया, वैसे ही वह कन्या विद्युत गति से, उसके हाथ से छूटकर आकाश में चली गई और कंस को संबोधित कर  पुनः एक आकाशवाणी हुई ,” अरे मूर्ख, तू जिसे मारना चाहता है, तेरा वह काल  जन्म ले चुका है। तेरा विनाश निश्चित है।” फिर आकाश में एक दिव्य आभा मंडल उदित हुआ और वह कन्या उसमें समाविष्ट हो गई।नेत्र विस्फारित किए, कंस और,सभी लोग इस अद्भुत दृश्य को देखते रहे। पलक झपकते ही सब कुछ सामान्य हो गया। केवल कंस कुछ क्षण तक,कभी अपने खाली हाथ और कभी आकाश को विस्मय से देखता रहा और फिर परास्त सा भूमिपर बैठ गया और कुछ बड़बड़ाता हुआ अपने गाल और माथा पीटने लगा। वसुदेव- देवकी नेत्र बंद किए,हाथ जोड़कर इस ईश्वरीय चमत्कार पर मुग्ध थे।एक दीर्घ अंतराल के बाद उनके मुख पर स्निग्ध शांति थी। कंस धीरे से उठा और पराजित कदमों से लौट गया।
उसी दिन कंस ने दोनों को कारागार से मुक्त कर दिया। वैसे भी अब उन दोनों के लिए इस मुक्ति का कोई अर्थ नहीं था ।आज की घटना ने उनके अंतर्चक्षु खोल दिए थे। हरिइच्छा के प्रति पूर्ण  समर्पण ही उनकी प्रसन्नता थी। इस बीच उन्हें पता चला कि कंस किस प्रकार उनके अष्टम पुत्र को ढूंढने में लगा है। यहांँ तक कि उसने मथुरा के आस पास के ग्रामों में जन्मे अनेक निरीह नवजातों का, कृष्ण के भ्रम में वध करवा दिया है। पूतना,केशी ,अघासुर,बकासुर ,तृणावर्त ,शकटासुर और भी न जाने अपने कितने राक्षस अनुचरों को रोज गोकुल गाँव भेजता है।
उसे पता लग चुका है कि नंदराय  का पुत्र कृष्ण ही उसका काल और  उनकी आठवीं संतान  है। लेकिन उसके सभी कुप्रयास उस नन्हें से बालक के सामने विफल हो रहे हैं।
गोकुल से आने वाले नागरिकों से उन्हें सभी समाचार मिल जाते थे। परिचारिकाएं देवकी को बतातीं ,” बहुत बलशाली है कृष्ण। बल शाली ही नहीं, बहुत नटखट भी है। यशोदा जी तो , गोपियों से उसकी और उसकी गोप मंडली की शरारतों की  शिकायतें सुन- सुन कर परेशान हो गई हैं। मटकी फोड़ना और माखन
-चोरी में तो निपुण है कन्हैया। लेकिन जैसे ही यशोदा उसे डांँट फटकारने लगती हैं, यह ऐसा भोला भाव दिखाता है कि  माँ  उसे गले से लगा लेती है। गोचारण का हठ करता है ।और  उसकी बात न मानें तो ऐसा रुठता है कि लाख मनाने से भी नहीं मानता। लेकिन इतना होने पर भी वह सबकी आँखों का तारा है। ”
परिचारिकाओं की बात सुनकर देवकी सोचती काश! वह भी अपने पुत्र की बाल लीलाएँ  देख पाती। वह भी उसे अपनी गोद में बिठा कर नाना मिष्ठान्न खिलाती। वह जब उसे मैया कहकर पुकारता, तो उसकी तुतली बोली पर बलिहारी जाती। और  फिर उसका मन गोकुल की वीथियों में उत्पात मचाते उसके कान्हा को ढूँढने लगता। उसके नेत्र अश्रु पूरित हो जाते। उसका अतृप्त ममत्व पुत्र के  कोमल स्पर्श को, उसके दरस को तड़प उठता।वह मन ही मन यशोदा के प्रति आभार प्रकट करती जिसने उसके कान्हा को इतना लाड़ प्यार दिया।
इसी समय उन्हें  समाचार मिला कि कंस के , नित प्रति होने वाले अत्याचारों और कुचक्रों से त्रस्त होकर नंद जी और सभी लोग गोकुल छोड़ कर जा रहे हैं। कहाँ जा रहे हैं?  पता नहीं। सुनकर उनका मन उदास हो गया। अभी तोकृष्ण के समाचार मिल जाते थे।  उन्हीं के सहारे तो वे जी रहे थे।अब क्या होगा? देवकी के आँसू तो थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे , तब वसुदेव ने ही उसे संभाला। वसुदेव किलने धैर्यवान और विवेकशील हैं। उन्होंने सदा ही अपनी वेदना को भुलाकर उसे सहारा दिया है।

भाग 5
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आज एक दीर्घ अंतराल के बाद, उसे समाचार मिला है कि कंस, अक्रूर जी को कृष्ण को मथुरा  लाने के लिए भेज रहा है। उसने धनुष,यज्ञ का आयोजन किया है।वह चाहता है कि कृष्ण, बलराम  और नंद जी के साथ इस उत्सव में भाग लें। यह सुनते ही पति- पत्नी का माथा ठनक गया। यह स्नेह आमंत्रण तो कदापि नहीं है, कंस का कोई षडयंत्र है। अक्रूर जी ही बता पाएंगे। अगले दिन वसुदेव अक्रूर जी को बुलवाया था। अक्रूर  वसुदेव जी के चचेरे भाई और सौम्य शांत प्रकृति के व्यक्ति थे। उन्होंने बताया कि इस,आमंत्रण का  उद्देश्य, उत्सव के बहाने कृष्ण बलराम को  मथुरा बुलवा कर  उनका वध करवाना है।अपनी आशंका को सच पाकर वे व्याकुल हो गए। देवकी ने अक्रूर से कहा” भ्राताश्री , आप महाराज को समझाइए। वे आपका बहुत सम्मान करते हैं। आपकी बात मान जाएंगे। आप कृष्ण को मथुरा मत लाइए।”
अक्रूर ने कहा कि मतिभ्रष्ट व्यक्ति किसी की नहीं सुनता। और यह उन्हें अपना शत्रु मानता है। यदि वे नहीं जाएंगे तो कंस किसी अन्य को भेज कर उन्हें यहाँ बुला लेगा। लेकिन तुम चिंता मत करो, यह कृष्ण बलराम के रूप में यह स्वयं, अपने काल को निमंत्रित कर रहा है।
“बलराम कौन हैं ?” देवकी ने पूछा।
“बलराम कृष्ण के बड़े भाई हैं। हमारी सप्तम संतान “वसुदेव ने कहा और फिर  देवकी,के समक्ष सब रहस्य उगाजर किया। देवकी हर्षविह्वल हो गई “बलराम मेरा पुत्र है। अब कितना बड़ा होगा वह?”  उसने कौतूहल दिखाया।

” देवि,जब वे यहाँ आएंगे, तो आप स्वयं ही उन्हें देख लेना।और आप किसी प्रकार की चिंता नहीं करें। आपके दोनों पुत्र असाधारण बल शाली हैं, उन्हें क्षति पहुँचाने की सामर्थ्य किसी में नहीं है। ” अक्रूर जी ने उन्हें आश्वस्त किया़।
” भ्राता श्री, आप सबसे पहले मेरे पुत्रों को मेरे पास ही लाना। मैं उन्हें जी भर कर देखूँगी। उन्हें—। ”
“अभी कह रही थीं, मेरे पुत्रों को मथुरा मत लाना और अब उन्हें देखने के लिए इतनी उतावली हो रही हो।”  वसुदेव ने देवकी को मधुर उपालंभ दिया। लेकिन देवकी तो किसी अन्य ही आनंद लोक में मग्न हो गई थी। जहाँ उसके पुत्र थे और थी उसकी ममता की अबाध अजस्त्र निर्झरिणी।

अगले दिन अक्रूर नंद, बल और कृष्ण  को लेने  वृंदावन चले गए। और देवकी आँखे बिछाए उनके आगमन की प्रतीक्षा में बैठ गई। दिन रात एक ही राग ” मेरे पुत्र  मुझसे मिलने आएंगे ” उसके अंतस में गुंजायमान रहता। और दो दिन बाद ही, देवकी को  यह कर्णप्रिय मंगल समाचार मिला कि वे सब आ गए हैं और नगर के मुख्य द्वार के समीप, स्थित  वाटिका में रूके हैं। कल प्रातः वे नगर में प्रवेश करेंगे । सुनते ही वह उनसे मिलने को वावरी हो उठी।
वसुदेव ने समझाया ,” वे राज अतिथि बन कर आए हैं। उनका पहले महाराज से भेंट करना ही उचित होगा।  तुम थोड़ा धीरज धरो ” समय आने पर वे हमसे  मिलने अवश्य आएंगे।

लेकिन देवकी का धैर्य तो अधीर हो चुका था। जैसे तैसे मन मारकर बैठ गई और फिर ईश्वर से उनके मंगल  के लिए प्रार्थना करने लगी,”कल वे भ्राता कंस से भेंट करेंगे। उनकी रक्षा करना प्रभु। कंस को विवेक  बुद्धि देना।”

और फिर भोर होते ही वह अपने भवन की छत पर आ बैठी।  लेकिन आज उसके मन में आशा की उजास थी। उसे लग रहा था कि अब उसके कष्टों का अंत होगा। उसके और मथुरा के तारण हार बन कर आए हैं उसके कृष्ण -बलराम। इसी समय परिचारिका ने आकर  उसे  अक्रूर जी के आगमन का समाचार दिया। वह  उतावली हो नीचे आई। उसका कौतूहल दीप्त मुख देख कर अक्रूर  विस्मित हो गए। फिर परिहास करते हुए बोले, लगता है भाभी श्री ने पूरी रात पुत्रों के बारे में ही सोचते ही  काटी है। ”
देवकी ने कहा ,” यह तो मैं पिछले पंद्रह वर्षों से कर रही हूँ भ्राता श्री। अब आप,शीघ्र ही मुझे वृंदावन  का समाचार दीजिए । कैसे हैं मेरे लाड़ले? कैसी हैं ममता की प्रतिमा देवी यशोदा ?”
अक्रूर ने उन्हें विस्तार से सब बताया और फिर यशोदा ने देवकी के लिए जो संदेशा भेजा था, वह भी सुनाया।

” भाभी श्री, यशुमति ने कहा है कि वह आपकी आभारी हैं, जो आपने उन्हें संतान सुख,उठाने का अवसर दिया।  वे उनका  यह ऋण  कभी चुका नहीं पाएँगी।  वे केवल उनकी धाय मात्र हैं। गाँव के सरल और सीमित साधनों में ही उनका पालन हुआ है। कुछ कमी रह गई हो तो देवकी अपनी इस छोटी बहन को क्षमा कर दे।”यशोदा की विनम्रता देख,उनका संदेश सुन ,देवकी का मन भर आया। अश्रु  छलकाती भावुक कंठ से बोलीं, “यशोदा ही मेरे पुत्रों की रक्षिका हैं । सही अर्थों में जननीतो वही हैं। मैं तो उनके चरणों की धूलि भी नहीं हूँ।मैने माँ का कोई  दायित्व कभी नहीं निभाया।उनके जैसा लालन- पालन तो आज तक किसी माँ ने नहीं किया होगा। उनकी ममता के सम्मान में प्रकट करने योग्य शब्द ही नहीं हैं मेरे पास।” कहती हुई  देवकी भावावेश में चुप हो गईं।

अक्रूर मूक हो,ममता की इस अबाध धारा का अविरल, प्रवाह देखते रहे और फिर हँसकर बोले बोले, “अब तो आपको ही संभालना होगा अपने इन नटखट बालकों को। इतने उत्पाती हैं कि सारे गोकुल और वृंदावन की नाक में दम कर रखा था इन दोनों ने। गाय, बछड़े, गोपी, ग्वाले सभी परेशान। वंशी बजा- बजा कर सबको बावला बना दिया तुम्हारे इस कान्हा ने।  पनघट जाती गोपियों की तो शामत है ,तुम्हारा यह  छोटा लाड़ला। इनके आने पर चैन की साँस लेंगे अब सभी। और हाँ, खाने- पीने के मामले में भी बहुत सिर चढ़े हैं। दही, दूध, माखन, मिसरी के तो ऐसे चटोरे हैं  कि इनका बस चले तो सारे गाँव का माखन अकेले ही चट–।” ,

“अब बस  भी करो भ्राता श्री।  मेरे ही सामने
मेरे बेचारे बच्चों को न जाने क्या- क्या कह रहे हो ? उनके खाने -पीने पर नज़र लगा रहे हो। वसुदेव जी से तुम्हारी शिकायत करनी ही पडे़गी। ”
देवकी ने  रुठ कर कहा। सामने से आते हुए वसुदेव देवर -भाभी की नोंक- झोंक का आनंद लेने लगे।
सहसा ही अक्रूर उठ खड़े हुए। “अब चलने की आज्ञा दें। अभी नंदराय और सबको धनुषयज्ञ -सभा में ले जाकर , उन्हें महाराज से मिलवाना है।” कहते हुए अक्रूर ने उनसे विदा ली।

भाग 6
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उनके जाते ही देवकी  फिर चिंतित कहो उठी। दुष्ट कंस न जाने अब क्या षड़यंत्र रचेगा। वसुदेव भी आशंकित थे। और उनकी आशंका निर्मूल नहीं थी। धनुष यज्ञस्थल तक,पहुँचने से पहले ही मदोन्मत्त गज कुवलयापीड़ से उनका सामना हो गया। कंस के आदेश पर महावत ने उन्हें कुचलने के लिए अपने गज को उकसाया। यह तो कृष्ण -बलराम की तत्परता , फुर्ती
सजगता ,और पराक्रम  ही था कि उन्होंने उसका सामना कर, उसके दाँत उखाड़कर, उसका वध  कर डाला। फिर गजदंत  से ही उस दुष्ट महावत को भी यमपुर का मार्ग दिखा दिया। अब वे कंस से मिलने  जाएंगे।
जब यह  बातें जब वसुदेव- देवकी तक पहुँची, तो वे अनिष्ट की,आशंका से भयभीत और चिंतित हो उठे । उधर यज्ञ -सभा में, कंस अपने सिंहासन पर बैठा , मन ही मन आतंकित हो,नंद जी और कृष्ण बलराम की आतरता से प्रतीक्षा कर रहा था । कुवलयापीड़ और उसके महावत के वध की बात उसे पता चल चुकी थी। तभी नंद के साथ अद्भुत स्वरूप वान  दो कोमल किशोरों को, सभा में प्रवेश करते देख, उसे  विश्वास ही नहीं हुआ कि अभी यही दोनों कुवलयापीड़ और महावत को मौत के घाट उतार कर आए हैं। धनुर्शाला के प्रवेश  द्वार पर ही  एक सुसज्जित मंच पर  एक विशाल  धनुष रखा था। जिसकी आज पूजा की जानी थी। यह भगवान शिव का एक बहुत भारी और दिव्य धनुष था। कृष्ण ने , प्रहरियों के मना करने पर भी उसे कौतूहल वश उठा लिया और तोड़ दिया। कृष्ण कीयह उद्दंडता और शक्ति  देखकर कंस बेहद डर गया। कंस को  वृदांवन से लाए अनेक उपहार देकर ,नंद राय अपने दोनों पुत्रों के साथ दर्शक दीर्घा में जा बैठे। उत्सव में अनेक क्रीड़ा- आयोजन किए गए थे। मल्ल युद्ध का आयोजन भी था। कुवलयापीड़ का षड़यंत्र असफल होने के बाद अब कंस चाहता था कि वह अपने पहलवानों द्वारा दोनों भाइयों का वध करवा दे। चाणूर और मुष्टिक उसके प्रचंड मल्ल थे, जिनसे  भिड़ने का साहस कोई भी नहीं करता था। कंस के कहने पर इन दोनों ने कृष्ण- बलराम को मल्ल- युद्ध के लिए ललकारा। सभी उपस्थित लोगों ने इस प्रतिद्वन्दिता का विरोध किया । दो किशोरों का इन विशालकाय मल्लों से द्वन्द्व करना सबकी दृष्टि में अनुचित था। लेकिन,कंस ने इसकी सहमति दे दी।

चुनौती  को स्वीकारते हुए कृष्ण बलराम अखाडे़ में उतर आए और अपने कुशल दाँव पेंचों का प्रदर्शन करते हुए, उन दोनों को परास्त कर मौत के घाट उतार दिथा  । कंस यह देखकर भयभीत हो गया और सिंहासन से उतर कर अपने महल में भागने का उपक्रम करने लगा। तब कृष्ण ने उसके  केश पकड़ कर उसे धरती पर गिरा कर, भरी सभा में उसका वध कर दिया। कंस  वध  का समाचार  पूरी सभा में हाहाकार मच गया। लेकिन यह सुनकर  सारी मथुरा हर्षोल्लसित हो उठी।  श्रीकृष्ण बलराम की जय जय कार होने लगी।
कंस के समर्थक और मित्र  अपने प्राण लेकर, वहाँ से भाग गए। इसके बाद दोनों भाइयों ने जाकर अपने मातामह उग्रसेन जी को कारागार से मुक्त करवाया।
दोपहर ढलते -ढलते ही यह समस्त घटना क्रम घटित हो गया। अंततः  आकाश वाणी सत्य हो गई। आततायी कंस का विनाश सुनकर  सभी प्रसन्न थे और अपने तारणहारों के अभिनदंन की तैयारी कर रहे थे। वसुदेव और देवकी भी अपने विजयी पुत्रों को देखने के लिए लालायित हो उठे।वे भी  उनके स्वागत का भव्य आयोजन करने में संलग्न हो गए। देवकी पाकशाला में उनके लिए छप्पन भोग बनवा रही थी। इतने वर्षों का लाड़ दुलार  वह एक साथ ही उन पर उंडेल देना चाहती थी।

भाग 7
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नित्य प्रति की भांति देवकी, आज फिर अपने भवन की छत पर आ बैठी थी। आज वह अकेली नहीं थी । वसुदेव भी उसके साथ थे। आज उनके हर्षातिरेक का कोई  ओर छोर नहीं था। वे बार- बार अपने आराध्य देव को सिर झुकाते, जिनकी कृपा से आज यह शुभ वेला आई थी। उनके हृदयाकाश की भांति आज का आकाश  भी एकदम एक दम निर्मल था।  निशा की सारी कालिमा छंट गई थी। प्राची के गवाक्ष से झांकती रवि रश्मियां आज सब,ओर  एक नई  उजास छिटका रही थीं। पांति-बद्ध विहगावली ,नभ की कसौटी,पर  स्वर्ण रेख आंकती हुई उड़ रही थीं।शीतल मंद वतास,पुष्पों की सुवास विखरा रही थी। आज सब कुछ नया- नया सा लग रहा था। आज महाराज उग्रसेन का राज्याभिषेक  था। आज मथुरा फिर वही अनुपम श्रृंगार धार रही थी, जो उसने दशकों पूर्व, देवकी  के विवाह पर किया था।  पर आज किसी अशुभ आकाशवाणी के रसाभास की आशंका नहीं थी। आज केवल और केवल हर्ष था। चारों ओर  मंगल सूचक वाद्य बज रहे थे।
इसी समय  एक परिचारक ने उन्हें  नंद समेत श्रीकृष्ण और बलराम के आगमन का सुसंवाद किया। और अगले ही क्षण देदीप्यमान सूर्य के समान उनके दोनों पुत्र उनके सामने प्रकट हुए। गौर-नील मणि से कमनीय, अपने सुदर्शन, दिव्य स्वरूपवान  पुत्रों को  अपने समक्ष पाकर उन्हें अपने इस सौभाग्य पर  विश्वास नहीं हो रहा था। उनका कंठ भाव से अवरुद्ध था। चरण स्पर्श करते , उन दोनों को उठा। उन्होंने हृदय से लगा लिया। उनके अश्रु पुत्रों के मस्तक का अभिषेक कर रहे थे। वात्सल्य की अबाध जल -धारा उनके अंतस की सारी व्यथा को बहाकर ले गई। उनके जीवन की सारी कालिमा चिर काल के लिए छंट गई थी और  मंदिर के दीप की निर्धूम ज्योति सा उनका मन, स्निग्ध आलोक से पूरित हो उठा था। ऐसा आलोक जो सदा ही उनका और इस जगती का काम्य था।

वीणा गुप्त
नई दिल्ली

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