साहित्य

ये लड़कियां एक ज्वाला है

कुलदीप सिंह रुहेला

ये लड़कियां बेचारी सी क्यों लगती हैं
दुनिया की इस भीड़ में क्यों लाचार सी दिखती हैं
दिल में इनके आग है, आँखों में इक सपना है,
चुप रहने की आदत में भी, छुपा हुआ इक अपना है।

हर रोज़ लड़ाई खुद से है, हर रोज़ नया इम्तिहान है,
फिर भी हँसकर जी लेतीं यही इनकी पहचान है
कभी पिता की जिम्मेदारी कभी रिश्तों का बोझ उठातीं है
कभी अपने सारे ख्वाबों को ये चुपके-चुपके दफनातीं है!

जब ये खुद को पहचानें दुनिया भी झुक जाती है,
इनकी हिम्मत के आगे तो किस्मत भी रुक जाती है।
ना समझो इनको कमजोर ना इनको लाचार कहो,
ये आधी दुनिया की ताकत है इनका तुम सम्मान करो !

ये लड़कियां बेचारी नहीं ये तो हिम्मत की धारा हैं,
जब उठती हैं ये संग मिलकर, बदलती हर किनारा हैं
ये लड़कियां बेचारी नहीं ये ऊर्जा की नव धारा है
ये लड़कियां कमजोर नहीं ये उठती हुई एक ज्वाला है!

कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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