साहित्य

मोहब्बत हो न हो

शेख रहमत अली "बस्तवी"

शरारत तुमसे हो न हो,
सदाक़त तुमसे हो न हो।

मिरे होठों पर नाम तिरा,
मोहब्बत तुमसे हो न हो।

कई उम्मीद लगे तुमसे,
शफ़ाअत तुमसे हो न हो।

तुम्हें ढूंढा सहराओं में,
शिराक़ात तुमसे हो न हो।

उम्र भर चाहेंगे “रहमत”,
शिकायत तुमसे हो न हो।

शेख रहमत अली “बस्तवी”
बस्ती (उ.प्र.)
7317035246

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