
वह कोरा कागज़, वो सफ़ेद डगर,
जैसे ठहरा हुआ कोई थका सा सफ़र।
सब पन्नों ने अपनी कहानी सुनाई,
मगर इस खाली पन्ने ने खामोशी जताई।
न स्याही का दाग, न लफ़्जों का शोर,
न यादों की उलझी हुई कोई डोर।
शायद यहाँ वो आँसू गिरा होगा,
जिसे खाली पन्ने ने छिपाया होगा।
कलम रुकी रही, जज्बात बहते रहे,
जो हम खुद से भी कभी न कह सके।
वह कोरापन कोई अधूरा किस्सा नहीं,
मेरी रूह का सबसे निजी हिस्सा है वही।
लिखना जो चाहा, लिख न पाई,
अनकही जो बात, कह न पाई,
अधूरी कुछ कहानी,रह जाती है,
पन्नों की कोरी रंगत में खो जाती है।
पूर्णिमा सुमन
झारखंड धनबाद




