साहित्य

मूर्खता दिवस

अरुण दिव्यांश

मूर्खता जीवन का कोढ़ है ,
मानव को करता भ्रष्ट है ‌।
मूर्खता भरे इस जीवन में ,
हो जाता बहुत कष्ट है ।।
एक अप्रैल है मूर्ख दिवस ,
बनो मूर्ख बनाओ मूर्ख ।
मूर्खता दिवस है आया ,
कोई मूर्ख तो कोई धूर्त ।।
नौ को तुम छ: पढ़ाओ ,
छ: को पढ़ाओ तुम नौ ।
जौ को तुम गेहूॅ बताओ ,
गेहूॅं को बताओ तुम जौ ।।
भारत का मूर्खता धूर्तता ,
बहुत पुराना होता खेल ।
समझनेवाले समझ रहे ,
शेष बेंचते रहें निज तेल ।।

न‌ई सुबह का सूरज

न‌ई सुबह का सूरज ,
नव ले आया प्रकाश ।
सोकर जगीं चिडियाॅं ,
ताजगी ले एहसास ।।
चंदा भागा तारे भागे ,
निशा ग‌ईं हो उदास ।
आ गईं चंद किरणें ,
चकाचौंध आकाश ।।
नभ हर्षित भू हर्षित ,
न‌ई उषा नव उजास ।
सबका प्यारा सूरज ,
सबके अपने खास ।।
न‌ई उषा नव ताजगी ,
तम का हुआ नाश ।
टूट पड़े सूरज आते ,
तम के सारे फाश ।।
बैठा पड़ा अस्त हेतु ,
निशा का वह दास ।
कब डूबेंगे सूरज दा ,
कब मिटेगी प्यास ।।

दारू

दारू पूछे मेहरारू से ,
काहे नफरत दारू से ।
हमरे कारण पति‌ के ,
आरती उतारे झाड़ू से ।।
हम बानी सभे खातिर ,
एक बेर तू पी के देखs ।
हमरा ला रहबू बेचैन ,
हमरा ला जी के देखs ।।
हमर तोहर जात एके ,
तू त कैद रहेलू घर में ।
बोतल में हम कैद रहीं ,
तबहूॅं दरद काहे सर में ।।
तू दिल बसs चाहे ना ,
हम बसीं उनके दिल में ।
बड़ बनहीं के चाहत में ,
तू चलेलू ऊॅंच हिल में ।।
घर से निकलेलू जब तू ,
बाहर तूहूॅं खूब घूमेलू ।
मिलल घूमे का मोका ,
खुशी में तू खूब झूमेलू ।।
हम रहिले हमेशा कैद ,
हम कहाॅं बानीं आजाद ।
बोतल से गिलासे आईं ,
तब करिं उनके आबाद ।।
तू जेकर उड़ावेलू नीन ,
बेनीन के नीन सुताईले ।
हम त तोहर सहयोगी ,
तब काहे दुत्कार पाईले ।।

अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।

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