आर्यभट्ट की जयंती पर साहित्य रत्न से अलंकृत हुए सत्येन्द्र

मुजफ्फरपुर। प्राचीन भारत के महानतम गणितज्ञ और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट की जयंती के अवसर पर मुजफ्फरपुर के स्वर्णिम कला केंद्र में एक भव्य सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। इस गौरवशाली अवसर पर प्रख्यात साहित्यकार एवं इतिहासकार सत्येंद्र कुमार पाठक को उनकी विशिष्ट राष्ट्र सेवा और साहित्य में अतुलनीय योगदान के लिए थावे विद्यापीठ द्वारा ‘साहित्य रत्न’ की मानद उपाधि से अलंकृत किया गया। समारोह में स्वर्णिम कला केंद्र की अध्यक्षा डॉ. ऊषा किरण श्रीवास्तव ने श्री पाठक को अंग वस्त्र और स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया। विद्यापीठ के कुलसचिव डॉ. पी.एस. दयाल यति और कुलपति डॉ. विनय कुमार पाठक द्वारा प्रदत्त इस उपाधि की घोषणा के बाद देश भर के बुद्धिजीवियों में हर्ष की लहर है। डॉ. संगीता सागर, जी.एन. भट्ट और आचार्य डॉ. धर्मेंद्र सहित कई दिग्गजों ने उन्हें बधाई दी है। सम्मान प्राप्ति के पश्चात अपने संबोधन में सत्येंद्र कुमार पाठक ने आर्यभट्ट के कालजयी आविष्कारों पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने भावुक होते हुए कहा:”आर्यभट्ट केवल एक वैज्ञानिक नहीं, बल्कि उस भारतीय मेधा के प्रतीक थे जिसने उस समय दुनिया को दिशा दिखाई जब शेष विश्व अंधकार में था। यदि उन्होंने ‘शून्य’ न दिया होता, तो आज न कंप्यूटर की बाइनरी कोडिंग संभव होती और न ही अंतरिक्ष विज्ञान।” इतिहासकार पाठक ने रेखांकित किया कि आर्यभट्ट ने सदियों पहले वे तथ्य सिद्ध कर दिए थे, जिन्हें पश्चिम ने बहुत बाद में स्वीकार किया: उन्होंने ईसा पूर्व ही बताया था कि पृथ्वी स्थिर नहीं है, बल्कि अपनी धुरी पर घूमती है। उन्होंने राहु-केतु की पौराणिक कथाओं से इतर ग्रहण को पृथ्वी और चंद्रमा की छाया का वैज्ञानिक परिणाम बताया। गणितीय आधार: π (पाई) का सटीक मान और त्रिकोणमिति के सिद्धांतों की नींव भी आर्यभट्ट ने ही रखी थी। श्री पाठक ने अंत में नई पीढ़ी से अपील की कि वे अपनी जड़ों की ओर लौटें। उन्होंने सुझाव दिया कि आर्यभट्ट की जयंती को ‘भारतीय वैज्ञानिक चेतना दिवस’ के रूप में मनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बिहार के प्राचीन कुसुमपुर (पटना) से निकली वह मेधा आज भी शोध के क्षेत्र में भारत को ‘विश्व गुरु’ बनाने की शक्ति रखती है। यह आयोजन न केवल एक व्यक्ति का सम्मान था, बल्कि भारत की प्राचीन वैज्ञानिक विरासत का उत्सव बन गया है।




