साहित्य

गजल

पंडित मुल्क राज "आकाश"

तुम्हारे ख्यालों की महक जो उड़ी ,
मेरी धड़कनों की वो ग़ज़ल बन गई।

ख्वाबों के आंगन में खिलती हुई,
नूर की जैसे इक फ़ज़ल बन गई।

तेरी सादगी का अजब है असर,
धड़कन मुझको खलल बन गई।

इश्क की पाकीज़ा राहों पर चलूँ जो,
मेरी रूह मुझको असल बन गई।

मेरे दिल की तुम उजली दुआ में बसी,
जिंदगी हुई मुकम्मल सफल बन गई।

मेरी शायरी का तुम ही हो हासिल,
हर लब्ज में शामिल वो सजल बन गई।

मोहब्बत की राहों में वो मुकाम आया है,
कि अब हर लम्हा मुकम्मल बन गई।

जमीं पर रहकर हम आसमां छू लेंगे,
वफा का हर पैगाम अस हल बन गई।

नज़र से दिल का सफर मुकम्मल हुआ,
के ये धड़कनें दिल को महल बन गई।

तेरे नाम से रोशन महफिल जहां की,
आकाश की शायरी में असल बन गई।

पंडित मुल्क राज “आकाश”

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