
शहर की भागती सड़कों पर ठहरी सी है एक पुकार,
भीड़ में खोता इंसान, ढूँढ़े अपना ही आकार।
मोबाइल की रोशनी में धुंधले होते रिश्तों के रंग,
सच की आवाज़ दबती जाए, बढ़ता जाए शोर का ढंग।
समाचारों की सुर्खियों में बिकती रोज़ संवेदनाएँ,
आँखों के सामने ही क्यों मरती जातीं उम्मीदें-छायाएँ।
कहीं भूख अब भी सोती है टूटी चौखट के साये में,
कहीं सपने जलते देखे मैंने महलों की परछाईं में।
पर उम्मीद का दीप अभी भी टिमटिमा रहा है कहीं,
एक सच्ची कोशिश से बदल सकता है ये कल यहीं।
जागो, अब वक्त नहीं है यूँ ही खामोशी ओढ़े रहने का,
हर दिल में उजियारा भर, नया सवेरा गढ़ने का।
छोटे-छोटे कदम ही बनते बदलाव की बड़ी कहानी,
जागृति की इस राह पर लिखनी है नई निशानी।
~ जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी “जीत” छत्तीसगढ़



