
सुनो – सुनो ऐ धरती वालों,अपने कर्मों का परिणाम,
बैसाख गया औ जेठ जो आया, ‘सूरज दादा’ को क्रोध है आया।
वसुधा से गायब हुए वृक्ष हैं, कंक्रीट के वन पनप रहें हैं।
कुपित तपिश के प्रकोप से, धरती फटने को है तैयार।
बूँद-बूँद को तरसेगा जीवन, जो ना किया तुमने सुधार।
वृक्षारोपण औ संपोषण, यही तुम्हारा है हथियार।
लेते हो तो देना भी सीखो, एकमात्र यही संकटाहार।
सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों,कुछ कर लो तुम नेक विचार।
पूर्वजों से जो पाया तुमने, द्विगुणित कर वंशज-उद्धार।
भानु-क्रोध कुछ शिथिल होगा, आषाढ़ मेघों का अंबार।
दादा कभी ना रिपु हैं तेरे, बस पाठ पढ़ाने को गरमाते हैं।
नेह का मरहम मेह बरसता, सोंधी गमक उठाते हैं।
सारे प्राकृतिक उपादान जब तब पाठ पढ़ाने आते हैं।
कर्म भाव औ मनो भाव के सुर संगम ताल मिलाते हैं।
सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों, वसु-भूषण सदा सजाते हैं।
रचनाकार –
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन,सद्य: नि:सृत, रूद्रपुर, ऊधम सिंह नगर, उत्तराखंड।




