
काश…ये मुमकिन होता,
हम झाँक लेते किसी के दिल में,
पढ़ लेते उसके मन की बात।
काश…ये मुमकिन होता,
हम जान लेते कोई मुँह क्यों फेर लेता,
बिना मतलब क्यों नही पलट कर देखता।
काश…ये मुमकिन होता,
हम मिटा देते बीते कल की सिलवटें,
अपने आज को जीते हुए,
भविष्य की चिंताओं की धुंध हटा लेते।
काश…ये मुमकिन होता,
हम अपने हाथों की लकीरें खुद बनाते,
लिखते अपनी तक़दीर,
और किस्मत को इल्ज़ाम न दे पाते।
काश…ये मुमकिन होता,
हम अपनी मुट्ठियों में दबी क्रोध,नाराज़गी,और अवसादों से मुक्त हो पाते,
ताकि हम सुकून से जिंदा रह पाते।
काश…ये मुमकिन होता।
स्वरचित, मौलिक,
✍🏼 डा.संगीता पाण्डेय”संगिनी”,
(पी, सी, एम, पी,जी, कोलेज, कन्नौज )




