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शब्द साधना का गौरव: ईश्वर चन्द्र विद्यावाचस्पति सहित तीन कवि पड़रौना में सम्मानित 

मेंहदावल (संतकबीर नगर)। नगर के सुप्रसिद्ध कवि एवं सेवानिवृत्त शिक्षक ईश्वर चन्द्र विद्यावाचस्पति को उनकी साहित्यिक साधना एवं प्रभावशाली काव्य प्रस्तुति के लिए पड़रौना (जनपद कुशीनगर) स्थित उदित नारायण इंटर कॉलेज के विशाल सभागार में आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में भव्य रूप से सम्मानित किया गया।
इस गरिमामयी आयोजन में ईश्वर चन्द्र विद्यावाचस्पति के साथ-साथ ख्यातिप्राप्त कवि राजेन्द्र बहादुर सिंह ‘हंस’ तथा सूरज कुँअर ‘सरस’ को भी काव्य पाठ के उपरांत पीत-पट्टिका, स्मृति चिह्न एवं माल्यार्पण कर सम्मानित किया गया। विशेष रूप से विद्यावाचस्पति जी को हिन्दी साहित्य भारती सम्मान पत्र 2025, अंगवस्त्र, स्मृति चिन्ह, पुस्तकें, डायरी एवं हैंड बैग भेंट कर उनके योगदान को सराहा गया।


कवि सम्मेलन के दौरान ईश्वर चन्द्र विद्यावाचस्पति की ओजपूर्ण पंक्तियाँ—
“मैं आग लिये चलता हूँ, अंगार लिये चलता हूँ,
इतने अच्छे कवि श्रोता का प्यार लिये चलता हूँ।”
ने उपस्थित श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया और सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
यह राष्ट्रीय स्तर का आयोजन निराला शब्द संवाद मंच एवं हिन्दी साहित्य भारती संस्था के संयुक्त तत्वावधान में सम्पन्न हुआ, जिसमें भारत के विभिन्न राज्यों से लगभग 30 कवि, 15 कवयित्रियाँ तथा नेपाल से आए एक विशिष्ट कवि ने अपनी-अपनी रचनाओं से साहित्यिक वातावरण को समृद्ध किया। कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों को सम्मानित कर उनकी रचनात्मक साधना का अभिनंदन किया गया।
इस उल्लेखनीय उपलब्धि पर क्षेत्र के अनेक साहित्यकारों एवं बुद्धिजीवियों ने ईश्वर चन्द्र विद्यावाचस्पति को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ प्रेषित कीं। प्रमुख रूप से गिरिराज सिंह, मोहर नाथ मिश्र, बलवंत सिंह, संत प्रसाद, ब्रह्म नाथ पांडेय, अम्बर बस्तवी, छेदी लाल वर्मा, राजेश मृदुल, अजीत यादव, अनूप सिंह, परदेसी, लाल जी जायसवाल, गोंडा से सुधीर श्रीवास्तव, रायबरेली से शिवनाथ सिंह ‘शिव’, अवधी सम्राट इन्द्रेश भदौरिया, राम लखन वर्मा, गीता पांडेय, गोरखपुर से दिनेश गोरखपुरी, नंदलाल त्रिपाठी, देवरिया से पार्वती देवी ‘गौरा’, पड़रौना से ओम प्रकाश द्विवेदी, डॉ. सुधाकर तिवारी तथा देहरादून से डॉ. शिवेश्वर दत्त पांडेय सहित अनेक साहित्यप्रेमियों ने उनकी इस उपलब्धि को गौरवपूर्ण बताया।
यह आयोजन न केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति का उत्सव बना, बल्कि नवोदित और वरिष्ठ रचनाकारों के बीच संवाद का सशक्त मंच भी सिद्ध हुआ।

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