
दोहा 1
श्रीगुरु चरन सरोज रज,
निज मन मुकुर सुधारि।।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु,
जो दायकु फल चारि॥
शब्दार्थ
चरन सरोज– चरण कमल, मन मुकुर—मन रूपी दर्पण, विमल–स्वच्छ,जस–यश
सरलार्थ
सर्प्रथम मैं अपने गुरु के चरणकमलों की पावन धूलि को अपने हृदय में रूपी दर्पण में धारण करता हूँ। गुरु का स्मरण और मार्ग निर्देश ही हमारे मन के कलुषित विचारों को दूर करके,हमारे मन को दर्पण को उज्ज्वल करता है। मैं श्रीराम के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो जीवन में धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष (चार फल) प्रदान करता है।
दोहा (2)
बुद्धिहीन तनु जानिकै.
सुमिरौं पवनकुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं,
हरहु कलेश विकार ।।
सरलार्थ
मैं स्वयं को बुद्धिहीन मानकर पवन पुत्र (हनुमान) का स्मरण करता हूं,जो मुझे बल, विद्या और बुद्धि प्रदान कर मेरे समस्त कष्टों और दोषों को नष्ट करेंगे।।
चौपाई 1,2
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर,
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
राम दूत अतुलित बल धामा,
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥
शब्दार्थ
उजागर–प्रकाशित।
सरलार्थ
ज्ञान और गुणों के सागर उन श्रीहनुमान की जय हो, जिनका यश तीनों लोकों को (धरती, आकाश, पाताल ) प्रकाशित कर रहा है। हनुमान श्री राम के दूत और अतुलित बल शाली हैं। वे अंजनि माता और पवन के पुत्र हैं और उनका शुभ नाम पवनसुत है।
चौपाई 3,4
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥
शब्दार्थ
विक्रम–वीरता,बजरंगी–
हनुमान कुंचित –धुंधराले, कंचन–स्वर्ण
सरलार्थ
बज रंगी श्री हनुमान ,महा बलशाली और पराक्रमी
हैं। वे सभी प्रकार की कुमति ( बुरे विचार) को दूर कर सुमति प्रदान करते हैं। उनका वर्ण सोने के समान कांतिमय है। वे सुंदर वेश-भूषा धारण किए हैं। उनके केश घुंघराले हैं और उनके कानों में कुंडल शोभा दे रहे हैं।
चौपाई 5 ,6
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै,
काँधे मूँज जनेऊ साजै।।
शंकर सुवन केसरी नंदन,
तेज प्रताप महा जग बंदन॥
शब्दार्थ
काँधे –कंधे पर, सुवन–पुत्र
सरलार्थ
उनके हाथ में वज्र और ध्वजा शोभित है। सुपुष्ट कंधों पर मूंज का जनेऊ सज रहा है। वे शंकर जी के पुत्र केसरी के पुत्र हें। वे महा तेजस्वी और प्रतापी हैं। सारा संसार उनकी वंदना करता है।
चौपाई 7,8
विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया॥
शब्दार्थ
चातुर–चतुर,रसिया–रसिक
सरलार्थ
श्री हनुमान विद्यावान हैं। वे अत्यंत चतुर हैंऔर सदा,श्रीराम की सेवा कार्य करने को तत्पर रहते हैं। श्री राम क पावन चरित्र को सुन कर वे आनंदित होते हैं श्री राम-लक्ष्मण और श्री सीताजी सदा उनके हृदय में बसते हैं। वे निरंतर उन्हीं का चिंतन और स्मरण करते हैं।
चौपाई 9 ,10
सूक्ष्म रूप धरी सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
भीम रूप धरि असुर सँहारे।
रामचन्द्र के काज सँवारे॥
सरलार्थ
श्रीराम का आदेश पाकर वे श्री सीता की खोज में लंका गए और सूक्ष्म रूप ( लघु रूप) में माता जानकी के समक्ष प्रकट हुए। उन्होंने विकराल रूप धारण कर लंका दहन किया। भीषण रूप धारण कर सभी असुरों का संहार किया और प्रभु श्रीराम के कार्य (सीता जी का समाचार लाना)
को पूर्ण किया।
चौपाई 11,12
लाय सँजीवनि लखन जियाए।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाए॥
रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
सरलार्थ
श्री राम रावण युद्ध में ,जब मेघनाद के शक्ति प्रहार से जब लक्षमण जी मूर्छित हो गए, तब आप ही सुषेण वैद्य के परामर्श पर, सूर्योदय से पूर्व ही, संजीवनी बूटी लेकर आएऔर मृत प्राय लक्षमण जी के प्राणों की रक्षा की। आपके इस कार्य से प्रसन्न होकर श्रीराम ने आपको हृदय से लगाकर आपकी बहुत अधिक प्रशंसा की और आपको श्री भरत जी के समान अपना प्रिय बंधु माना।
चौपाई 13, 14
सहस बदन तुम्हरो जस गावें।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥
शब्दार्थ
श्रीपति—विष्णु, अहीसा– शेषनाग
सरलार्थ
श्री राम ने कहा कि हनुमान जी की प्रशंसा तो कोई अपने हजारों मुख से भी नहीं कर सकता। ऐसा कहकर लक्ष्मीपति (सीता पति) भगवान विष्णु (भगवान श्रीराम) उन्हें अपने कंठ लगाते हैं। ब्रह्मा, सनक आदि अनेक ऋषि,नारद जी और स्वयं शारदा(सरस्वती) और शेषनाग भी आपके गुणों का गान करते हैं।
चौपाई 15, 16
जम कुबेर दिक्पाल जहाँ ते।
कवि कोबिद कहि सकैं कहाँ ते॥
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राजपद दीन्हा॥
भावार्थ
यम, कुबेर, सभी दिशाओं के रक्षक दिग्पाल, कवि और बड़े बड़े विद्वान भी आपकी अपार महिमा का बखान करने में समर्थ नहीं हैं। आपने वानराज सुग्रीव पर उपकार किया। श्री राम से उनकी मित्रता करवाई और बालि का वध करवा कर, उन्हें उनका किष्किंधा का राज्य वापिस दिलवाया।
चौपाई 17, 18
तुम्हरो मन्त्र बिभीषन माना।
लंकेश्वर भए सब जग जाना॥
जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
सरलार्थ
तुमने ही विभीषण को श्रीराम की शरण में जाने का परामर्श दिया । जिसे मानकर वह रावण के पश्चात लंकापति बना। आपकी यह महिमा सब जानते हैं। आप बचपन से ही महिमावान रहे हो। दो हजार योजन पर स्थित सूर्य को आपने बचपन में ही मधुर फल समझ कर मुँह में रख लिया था।
चौपाई 19, 20
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
दुर्गम काज जगत के जेते ।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते
सरलार्थ
जब आप श्री सीता जी की खोज में लंका गए ,तो प्रभु श्रीराम जी ने श्रीसीता जी के लिए अपनी अंगूठी भेजी थी, जिसे अपने
मुख में सुरक्षित रखकर, आपने समुद्र पार किया दुस्तर सागर पार करना, आप जैसे अतुलित पराक्रमी के लिए कोई आश्चर्य का कार्य नहीं था।संसार के सभी दुर्गम (मुश्किल) कार्य आपकी कृपा से सुगम (आसान ) हो जाते हैं।
चौपाई 21, 22
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
सब सुख लहै तुम्हारी शरना।
तुम रक्षक काहू को डरना॥
सरलार्थ
आप श्री राम के द्वार रक्षक हैं। बिना आपकी आज्ञा के कोई उनके मंदिर मेंं प्रविष्टनहीं हो सकता। जो तुम्हारी शरण आता है, उसे किसी का भी, किसी भी प्रकार का भय नहीं रहता। तुम सभी सुखों के दाता हो।
चौपाई 23,24
आपन तेज सम्हारो आपै ।
तीनौं लोक हाँक ते काँपे॥
भूत पिशाच निकट नहिं आवैं।
महाबीर जब नाम सुनावै॥
सरलार्थ
आप अतुलित तेजस्वी हैं। आप ही इतने तेज को संभालने में सक्षम हैं। तीनों लोक के प्राणी आपकी एक ही हुँकार सुनकर काँपने लगते हैं। कोई भी आसुरी शक्ति, भूत ,पिशाच आदि आपका नाम सुनकर भाग जाते हैं।
चौपाई 25,26
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
संकट से हनुमान छुडावैं।
मन क्रम वचन ध्यान जो लावैं।
सरलार्थ
आप के नाम का निरंतर जाप,करने से सभी प्रकार के रोग और शोक से निदान प्राप्त होता है। मन, कर्म और वचन से जो निष्ठा पूर्वक आपका ध्यान करता है, आप संकट मोचन बन कर, उसे सभी संकटों से मुक्ति प्रदान करते हैं।
चौपाई 27,28
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा॥
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोई अमित जीवन फल पावै॥
सरलार्थ
तपस्वी वेश धारी, अयोध्या के महाराज (दशरथ जी के निधन के बाद भरतजी ने श्री राम को ही अयोध्या का राजा मानकर, उनकी चरण पादुकाएँ राज सिंहासन पर प्रतिष्ठित की थीं) श्री राम के सभी कार्यों को तुमने कुशलता पूर्वक पूर्ण किया।
आप की उपासना करने वाले कि हर इच्छा पूरी होती है और वह अपने जीवन में अमित सुख प्राप्त करता है।
चौपाई 29,30
चारों युग प्रताप तुम्हारा।
है प्रसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥
सरलार्थ
चारों युगों में आपके प्रताप और वीरता का उद्धोष होता है। आपके तेज सारे संसार को प्रकाशित करता है। तुम सज्जन और संतों के रक्षक हो। असुरों का मर्दन करते हो। तुम प्रभु श्रीराम के प्रिय भक्त और सेवक हो।
चौपाई 31, 32
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस वर दीन्ह जानकी माता॥
राम रसायन तुमरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा।।
सरलार्थ
आप आठ प्रकार की सिद्धि और नव निधियों को देने वाले हो। तुम्हारे पास राम रूपी अमृत रस (रसायन) है। माता जानकी ने तुम्हें श्रीराम का चिर अनन्य सेवक बने रहने का आशीर्वाद दिया है।
चौपाई 33,34
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै॥
अंत काल रघुबर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥
सरलार्थ
आप का भजन कीर्तन करने से, प्रभु श्री राम की कृपा सहज ही प्राप्त हो जाती है और व्यक्ति के जन्म जन्मान्तर के पाप कर्म नष्ट हो जाते हैं। मृत्यु उपरांत उसे श्रीहरि का धाम ( साकेत) प्राप्त होता है और वह सदा के लिए हरि भक्त के रूप में जाना जाता है।
चौपाई 35, 36
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्व सुख करई॥
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
सरलार्थ
सभी इष्ट देवताओं को छोड़ कर, जो आपकी उपासना,सेवामें मन लगाता है, उसे सभी सुख प्राप्त होते हैं। महावीर हनुमान जी का स्मरण सभी कष्टों को दूर कर देता है।
चौपाई 37,38
जय जय जय हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
जो शत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥
सरलार्थ
हे गोसाईं हनुमान जी, मैं आपकी जय जय कार करता हूँ। आप मेरे गुरु हैं, मुझ पर कृपा कीजिए।
इस पुनीत श्री हनुमान चालीसा का जो भी व्यक्ति सौ बार पाठ करता है, वह सभी प्रकार के भव बंधन से मुक्त होकर, मुक्ति का परम सुख पा लेता है।
चौपाई 39, 40
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥
सरलार्थ
जो भी मनोयोग पूर्वक, हनुमान चालीसा का पाठ करता है, उसे भगवान शिव की कृपा से सभी कार्यों में सिद्धि प्राप्त होती है।
दोहा
पवनतनय संकट हरन ,
मंगल मूरति रूप।।
राम लखन सीता सहित ,
हृदय बसहु सुर भूप॥
सरलार्थ
पवन पुत्र श्री हनुमान जी, संकट मोचन और मंगल कि साकार प्रतिमा हैं। देवों में भूप (राजा)
के समान प्रमुख और प्रभाव शाली हनुमान जी सदा मेरे हृदय में श्रीसीताराम और लक्ष्मण सहित
निवास करें,यही मेरी आकांक्षा है।
सियावर रामचंद्र की जय
पवन सुत हनुमान की जय।
//इति श्री//
वीणा गुप्त
नई दिल्ली




