
विश्व पृथ्वी दिवस पर विशेष
🙏🙏🌎🙏🙏
“देख त्रास ”
वसुन्धरा बोली-:
निर्वस्त्र सा कर,
आनंदित होते हो??
साक्षात मृत्यु सामने है,
फिर भी सोते हो।
सारी सृष्टि मेरी संतान,
तुम्हारी मैं जननी हूँ।
सबकुछ नष्ट किए स्वार्थ में,
बहुत शर्मिन्दा हूँ, पर जिन्दा हूँ।
तुमने सृष्टि को अंग भंग किए,
दानवी यन्त्रों व कुल्हाड़ी से।
कवचहीन बना कर तुमने,
जला झुलसा दिए भावनाओ से।
इन सबको अब भी रोको,
कलप विलख कर कह रही धरा,
कुल्हाड़ी फेक, पेड़ पौधे लगाओ।
मैं देख रही हूँ, प्रलय काल!सृष्टि का अंत।
अब क्या देखना बाकी है मनुपुत्रों??
धरा बोली-:
कुल्हाड़ी से डरती नही मैं,
तरस आती है अपनी ही बनाई सृष्टि पर।
युद्ध ,
मेरे विरूद्ध !
मैं तेरी माता हूँ।
वसुन्धरा को नग्न मत कर निज स्वार्थ में हे मानव,
अब और नहीं बर्दाश्त मुझे,
देख अब त्रास।
मैं सृष्टि को ललकार रही!
वायरस के रूप धारण कर तांडव मचा रही।
******************************
ममता झा मेधा
डालटेनगंज




