साहित्य

बेटी का रिश्ता

कुमार अवधेश विद्यार्थी

वेबस पनहा चक्षु में आंसू,सज करके तैयार खड़ी है,
ऐसा लगता है वह मानो,बिकने को तैयार खड़ी है,
कोई कहे कुछ बतलाओ,कोई कहे जरा कुछ बोलो,
चलो जरा कुछ चाल देख लें, हंसो थोड़ा दांत देख लें,
कोई कहे क्या कर लेती हो,खाना-वाना कुछ आता है,
चश्मा क्यों पहना है तुमने,लगता है कुछ कम दिखता है,
लगता है वह पढ़ लिखकर भी,वेबस सी लाचार खड़ी है,….
ऐसा लगता है वह मानो ,वो बिकने को तैयार खड़ी है।
सबने अपने मन की कह दी, किसी ने ना पूछा उसका मन,
सारी चर्चा पूरी कर दीं,मगर बिताना उसको जीवन,
कुछ कहने को तो मन करता,पर मर्यादाओं ने बांध रखा था,
लोक लाज के कारण उसने,अपने मन को घोट रखा था
पिता का मान बचाने खातिर,निज इच्छाओं का हनन करे खड़ी है,……
ऐसा लगता है वह मानो, बिकने को तैयार खड़ी है।।
बिन गलती के कमी बताना,क्या बेटी का अपमान नहीं है,
बेटी है बेटी रहने दो,वो कोई सामान नहीं है,
सबका कहना मान रही वो,हम भी उसकी इच्छा जानें,
वह भी एक इंसान है लेकिन,हम भी उसको इंसान ही मानें,
वह भी अपने हृदय में है,लाखों सपना पाल खड़ी है……
ऐसा लगता है वह मानो,वो बिकने को तैयार खड़ी है।।
✍️ कुमार अवधेश विद्यार्थी ,सम्भल (उ0प्र0)

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