
धरती ने चुपके से मुझसे कहा,
“कब तक यूँ ही मुझको तुम जलाओगे?”
मैंने झुककर उसका हाथ थामा,
पर उत्तर में बस मौन ही पाओगे।
वो नदियों की धीमी सिसकियाँ हैं,
जो पत्थरों में अब घुल जाती हैं,
हरियाली के सपनों की चादर,
शहरों में कहीं खो जाती है।
पेड़ों की छाँव पूछती है,
“क्यों कुल्हाड़ी से रिश्ता जोड़ा?”
हमने ही अपने घर को तोड़ा,
फिर किस्मत पर इल्ज़ाम मोड़ा।
धूप भी अब कुछ थकी-थकी है,
हवा में भी है भारीपन सा,
धरती माँ की आँखों में अब,
छुपा हुआ है एक कंपन सा।
आओ फिर से वचन ये लें हम,
हर जख्म को उसका भर देंगे,
मिट्टी की हर मुस्कान के लिए,
जीवन का रंग फिर भर देंगे।
धरती सिर्फ ज़मीन नहीं है,
ये साँसों का आधार भी है,
जिस दिन ये रूठी हमसे तो,
सब कुछ होगा—पर संसार नहीं है।
राजलक्ष्मी श्रीवास्तव
जगदलपुर राजिम
छत्तीसगढ़




