साहित्य

विश्व पृथ्वी दिवस : लघुकथा  जियो जीने दो

डॉ. रेखा सक्सेना

शुभम सुंदर पक्का मकान होने के बावजूद अपने घर के बाहर पुराने एक नीम के पेड़ के पास अधिक समय बिताता था। गोलू उसका मित्र बोला– “क्या है जब देखो, यहीं बैठे रहते हो। चलो मेरे घर वहां ए.सी लगा है। वहां बैठकर शतरंज खेलते हैं” ।
शुभम बोला -” ए.सी से बिजली का बिल बहुत ज्यादा आता है, और मेरे तो शरीर में दर्द होने लगता है। अरे यार, यहीं पर अपना शतरंज ले आओ, बैठो और खेलते हैं”। गोलू शतरंज लाया पेड़ के नीचे बैठकर दोनों खेलने लगे। उसे भी अच्छा लग रहा था, नीम की ठंडी ठंडी छांव, कृत्रिमता से दूर शुद्ध हवा उसके मन को भा गई। इतने में नगर निगम के लोग आए बोले- ” यहां से हटो, यह पेड़ काटना है । चौड़ी सड़क बनेगी।” शुभम, गोलू दौड़कर मोहल्ले के सब लोगों को बुला लाए और पेड़ न काटने के लिए एक मत होकर सब वहीं अनशन पर सब बैठ गए।
उस भीड़ में शुभम ने कहा– “देखो देखो, इन पेड़ो पर चिड़ियों के कई घोंसले हैं। वह कितना सुंदर मधुर संगीत सुनाती हैं। गाय भी आकर बैठ जाती है। वह अपने बछड़े को कितने प्यार से चाटती है और सुकून महसूस करती है। बच्चे भी रस्सी डालकर झूला झूलकर बहुत खुश होते हैं ।लोग बीमार होने पर नीम के पत्तों के पानी से नहाते हैं और इसकी डंडी से दातुन करते हैं। अरे ! कितने गुण गुनाऊं। आप सब यहां से चले जाओ। आधुनिकीकरण के चक्कर में सबका जीना हराम हो गया है। जो करना है कर लेना, पेड़ नहीं कटने देंगे ……..।”

लेखिका– डॉ. रेखा सक्सेना
मुरादाबाद ,उत्तर प्रदेश।
मौलिक, अप्रकाशित ।

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