साहित्य

मां का कर्ज (लघुकथा)

जयचन्द प्रजापति 'जय'

रोहन के पिता की मौत के बाद सारी जिम्मेदारी मां के उपर आ गयी। गिरे हालात बन गये। कमाने वाला चला गया। घर गृहस्थी पूरी तरह से टूट गयी। किसी तरह से मां मजदूरी करके जीवन यापन किया। रोहन को पढ़ाया लिखाया। रोहन कभी-कभी जिद करता पैसे मांगने की। मां के पास पैसा न होने के कारण नहीं देती।

ज्यादा जिद करने पर ममता टूट जाती। भावनायें बिखरने नहीं देना चाहती। बाप की कमी का एहसास न होने पाये कि बाप होता तो पैसे मिल जाते। किसी से उधार लाती और दे देती। रोहन का लड़कपना था। उसे मां के दयनीय हालातों से क्या लेना देना?

मां सदैव रोहन का ख्याल रखती। अपने बेटे के लिए बाप की कमी नहीं खलने दी। समय गुजरने लगा। रोहन की भी शादी हो गयी। घर गृहस्थी का बोझ सिर पर आ गया। अब उसकी मां बुढ़ी हो गयी। कभी बेटे से कुछ खरीदने के लिए मां पैसे मांगती तो रोहन मना कर देता। पैसे कहाँ है मां। तुम रोज जिद करती हो। कहाँ से लाऊँ?

एक रात रोहन ने सपना देखा कि उसके बचपन में मां कितना कष्ट उठाकर पढ़ाया लिखाया। तुम्हारी हर जरूरत को पूरा करने के लिए उधार भी ले लेती। तुम्हारी हर आवश्यकता की पूर्ति के लिए मां रात-दिन मेहनत करके तुम्हारी हर जरूरत पूरा की। भूखे रहकर तुम्हे भूखा नहीं रखा।

आज उस मां की छोटी-छोटी आवश्यकतायें की अनदेखी कर रहा है। मां दुनिया की तुम्हारे लिए सबसे बड़ी ताकत है। मां जीवन में एक बार मिलती है। उस मां का ह्रदय मत दुखाओ। रोहन की आंखें खुली तो देखा उसकी माँ कुछ गहने रखी थी। अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए किसी सुनार से बेंच रही थी।

रोहन ने अपनी माँ के चेहरे को देखा। मैं इतना भी नहीं कर सकता कि मेरी माँ खुश रहे। आज अपनी आश्यकता की पूर्ति के लिए गहने बेंच रही है। धिक्कार है मेरी जिंदगी की। झट से मां के करीब गया और कहा कि मां आज से तू मेरी बैंक है। मैं सारे पैसे इसी बैंक में रखूंगा। मां से कह दिया कि जिस चीज़ की आवश्यकता हो वह बिना पूछे खरीद सकती है। रोहन को समझ आ गया कि मां का कर्ज उतारना असंभव है। अब वह अपनी बुढ़ी मां का ख्याल रखने लगा।

……..
जयचन्द प्रजापति ‘जय’
प्रयागराज

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