साहित्य

​डिजिटल दुनिया और रील का रायता

डाॅ.दक्षा जोशी ' निर्झरा'

​सुबह सवेरे नींद न आए,
हाथ खोजता फोन,
बिस्तर पर ही शुरू हो गया, डिजिटल ‘ओम-नमो-नम:’।
दातून-कुल्ला बाद में होगा,
पहले स्टेटस डालेंगे,
दुनिया को हम सुखी होने के, नुस्खे नए सिखाएंगे।
​सत्य परेशान है पर…
चेहरे पर है फिल्टर भारी,
मन में भरा गुबार है,
असली चेहरा भूल गए सब, ‘मेकअप’ का अवतार है।
घर में झगड़ा चल रहा है,
बर्तन बजते जोर से,
पर रील में हम नाच रहे हैं,
‘कपल गोल्स’ के शोर से।
​ज्ञानी बाबा का उदय
फेसबुक के आंगन में अब,
ज्ञान की बहती गंगा है,
वो भी उपदेश दे रहा,
जिसका ख़ुद का भविष्य नंगा है।
लिखते हैं, ‘क्रोध न करिए,
शांति परम सुखकारी है’,
नीचे किसी ने ‘भैंस’ लिख दिया, तो शुरू गाली-गलारी है।
​दुःख का प्रदर्शन
एक्सीडेंट भी हो जाए तो,
पहले फोटो खिंचवाते हैं,
ख़ून बहा हो सड़क पर तो, ‘इमोजी’ रोने वाला लगाते हैं।
अस्पताल के बेड से भी,
‘चेक-इन’ करना ज़रूरी है,
बिना ‘लाइक’ के पट्टी बंधना,
मानों बड़ी अधूरी है।

-डाॅ.दक्षा जोशी ‘ निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।

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