आलेख

एक कोना अधूरा सा

अभिलाषा श्रीवास्तव

जोडने की कड़ी में टूटती रहीं
यह कहानी कोई जमाने पुरानी नहीं
बल्कि मध्यम वर्ग के चक्की में पीसती हूई उन महीलाओं की है जिसके पिता व भाईयों ने सभ्य का वस्त्र धारण कर लिया है उसके टूटने व जुटने का फर्क़ किसी को नहीं
क्योंकि पीढ़ियों पहले भी एक सास ने अपनी बहू को बांट दिया था पांच बेटों में व एक सभ्य राजा की तीन रानीयाँ देखतीं रहीं
कुल के बहू को जंगल में जाते हुए क्योंकि उनके हिसाब से उनका पुत्र सही था
गलत सही व निर्णय के अवधी में हर बार गिर के उठती स्त्री ही है
हाँ यही सत्य है
सत्ता हो या आम शहर
दरवाजे खटखटाने के बाद भी
कोई कभी नहीं सुनता क्योंकि खटखटाने वाली स्त्री अगर बहू हो
अजीब है लेकिन मन की मिट्टी ने कहा लेखनी से
हे बहन सुनों,
क्या फिर से स्त्री बनकर आना चाहोगी
शायद कोई स्त्री नहीं आना चाहिए
क्योंकि सब कुछ बदल रहा है लेकिन कुछ चीजें केवल बदलने का अभिनय कर रहा है।

अभिलाषा श्रीवास्तव
गोरखपुर

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